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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
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🔮 भाग 3⃣7⃣
💡 क्रोधी, दम्भी, मात्सर्य
ईर्ष्यावश और
भेदबुद्धि होकर
हिंसा करते हुए
जो मेरी पूजा करता है
वह तामसिक भक्त है.
💡 इन्द्रियों का सुख-भोग
प्रारब्ध के अनुसार
निश्चित ही मिलता है.
इसलिए अपने आप
प्राप्त होने वाले
सुख भोग के लिए
अत्यधिक परिश्रम और
प्रयास की क्या आवश्यकता ?
💡 पाप और पुण्य कर्मो के फल
आपस में एडजस्ट नही होते.
पाप का फल दुःख और
पुन्य का फल सुख
भोगना ही पड़ता है .
🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚
🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn
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