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Friday, 8 June 2018

Kaaran Ya Bhav | कारण या भाव

कारण या भाव

🌀 कारण या भाव 🌀

🌀 किसी भी कार्य के करने में हमारा भाव
ही महत्वपूर्ण है फल का निर्धारण भी
भाव के अनुसार होता है ।
हम भजन को ही ले भजन करते हुए
हम पहचान चाहते हैं तो पहचान
मिलेगी, भगवान नहीं ।
अनेक बार बाहर से एक सी क्रिया
होने पर भी फल भाव के अनुसार
अलग दीखता है ।

🌀 मन्दिर का एक पेड पुजारी
तनखाह के लिए काम करता है ।
उसका सुंदर श्रृंगार करना
उसकी एक्सपर्टता है, भाव नहीं ।
इसलिए वह हजार रुपये अधिक मिलने
पर दूसरे मन्दिर में चला जाता है ।
अतः हमें भी सदा अपने को टटोलते
रहना चाहिए । हम जो कर रहे हैं
वह मूल उद्देश्य के लिए है
जो दिख रहा है या दिल में कोई
छिपा उद्देश्य भी है ।
छिपा उद्देश्य यदि है
तो यह कपट है ।
और कपट चाहे लोक में हो
या भजन में हो कभी भी
सफलता नहीं मिलेगी ।

🌀 अतः शुद्ध मन से कपट
रहित होकर भजन में लगना चाहिए ।
भजन में लगने का कारण
भजन अर्थात श्रीकृष्ण-सुख ही
होना चाहिए । यहाँ तक कि अपने
दुखों की मुक्ति-मोक्ष
को भी कपट ही कहा गया है ।

🙏 समस्त वैष्णव वृन्द को मेरा सादर प्रणाम

🐚 ।। जय श्री राधे ।। 🐚
🐚 ।। जय  निताई ।। 🐚

🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

धन्यवाद!!
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Tuesday, 28 November 2017

Hamara Target Kya



✔ *हमारा टारगेट क्या* ✔

↪सृष्टि में विविधता है और विविधता सृष्टि का प्रथम महत्वपूर्ण गुण है । दो पत्ता भी एक सा नहीं है दो मनुष्यों की शक्ल भी एक सी नहीं है ।

 ↪इसी विविधता के कारण कुछ मनुष्य सदाचार परोपकार स्वधर्म पालन में लगे हुए हैं और उनका टारगेट संभवत यश है ।

↪कुछ मनुष्य धनोपार्जन में लगे हुए हैं येन केन प्रकारेण धनोपार्जन करना उनका टारगेट धन है।

 ↪कुछ मनुष्य येन-केन-प्रकारेण अपनी कामनाओं की पूर्ति में लगे हुए हैं यह कामना यह वासना यह इच्छा वह इच्छा ।

↪कुछ लोग ऐसे हैं जो इस जीवन के दुखों से परेशान हो गए हैं वह इस संसार में बार-बार आने जाने से मोक्ष चाहते हैं ।

↪इन सब के अतिरिक्त हम आप जैसे कुछ लोग हैं जो भक्ति में लगे हुए हैं भजन में लगे हुए हैं कृष्ण चरण सेवा चाहते हैं भगवान की कृपा चाहते हैं भगवान की कृपा से भगवान की चरणों की परमानेंट सेवा चाहते हैं ।

↪अब बात यह है कि जो जो चाहते हैं उस में लगे हुए हैं हम लोग यदि भजन भक्ति चाहते हैं तो हम यह समझ लें कि हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है भजन । भक्ति । हमारा जीवन, कम से कम हमारा जीवन भजन भक्ति के लिए मिला है ।

 ↪और यदि भजन भक्ति के लिए जीवन मिला है तो सबसे अधिक प्राथमिकता हम भजन भक्ति को दें अधिक समय भजन भक्ति को दें और संसार में जो दायित्व हमारे ऊपर हैं उन्हें अनासक्त होते हुए निभाते रहे और संतुलन रखें । जो विभिन्न विषयों में संतुलन रखकर साधते हुए चलता है वही साधु है ।

↪फिर भी जैसे किसी का टारगेट धन है किसी का टारगेट यश है किसी का टारगेट कामना है किसी का टारगेट मोक्ष है । हमारा टारगेट भजन है, भक्ति है ।

↪यह सदा स्मरण रहे तो हमारे प्रयास भी इस ओर अधिक से अधिक होने लगेंगे ।

जय श्री राधे जय निताई
समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

Friday, 24 November 2017

Gyan Kriya Bal


ज्ञान
क्रिया
बल

ये तीन स्थिति हैं
सर्व प्रथम भजन का ज्ञान प्राप्त होता है,
जानकारी होती है

जानकारी के बाद भजन में लगते हैं
क्रिया, करना प्रारम्भ करते हैं

क्रिया करने से बल, आत्मविश्वास
होता है । तभी व्यास जी कहते हैं

व्यास भरोसे कुंवरि के
सोवत पांव पसार

अथवा
हम श्री राधाजू के बल अभिमानी

समस्त वैष्णवजन को दासाभास का प्रणाम


समस्त वैष्णववृन्द को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn 

Tuesday, 7 November 2017

दासाभास लेखनी भाग 7

दासाभास लेखनी


🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒
             दासाभास लेखनी
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💎 भाग 7⃣

1⃣ ।। सब एक ही बात नहीं है ।।
अपनी साधना में जो सिद्ध हो चुके हैं ऐसे शांतरस के साधक - सिद्ध लोक को
दास्य भाव के साधक - वैकुण्ठ लोक को
शुद्ध सख्य- वात्सल्य- मधुर भाव के साधक गोलोक में जाते हैं। उपासना एवं भाव से अलग-अलग लोकों की प्राप्ति होती है.

2⃣ आम आदमी सांप को मार सकता नहीं। सपेरा मार सकता है, लेकिन मारता नहीं। उसके विषदन्त निकाल कर खेलता है ऐसे ही कामना वासना को मारो नहीं, उनमें से संसार-विषय विष निकाल कर उन्हें श्रीकृष्ण सेवा में लगा कर खेलो और आनंदित रहो.

3⃣ बन्दूक - जिस प्रकार एक गोली अपनी बन्दूक द्वारा प्रयोग करने पर ही काम करती है। उसी प्रकार मंत्र या भजन गुरुदेव द्वारा प्राप्त होने पर, उनके आनुगत्य में करने पर ही फल देता है। यदि भजन शुरू हो भी जाए तो पहले गुरुदेव मिलेंगे। फिर भजन का फल श्रीकृष्ण-सेवा मिलेगी वैसे ही जैसे यदि गोली मिल जाय तो बन्दूक खरीदनी पड़ेगी और बन्दूक मिल जाय तो गोली भी चाहिये।

🔔 ।। जय श्री राधे ।। 🔔
🔔 ।। जय निताई  ।। 🔔

🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Tuesday, 24 October 2017

Paap nahi hota


🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳

✔ *पाप नहीं होता* ✔

➡ भजन, भक्ति में नियमों का
पालन न करने से कोई पाप
नहीं होता है, जिसका कोई
अलग से फल भोगना पड़ता हो

➡ भजन, भक्ति में अपराध होता है
अपराध के कारण भजन, भक्ति की
गति में बाधा या असंतोष होता है, जो कि
भजन से ही मार्जित या दुर् होता
जाता है, विशेषकर नामजप से ।

➡ नाम जप प्रारम्भ में योग्य बनाता है,
फिर साधन बनता है, फिर साध्य बन
जाता है । ये तीन अलग अलग नहीं,
नाम वही एक ही है, बचपन, जवानी
बुढापे जैसी स्थिति है ।

➡ अतः जैसे भी बन पड़े, भजन अंगों को
आज से ही शुरू कर दो, निष्ठा एवं
भाव पूर्वक लगे रहो । भजन के प्रभाव से
ही शुद्ध होता जाएगा, मार्ग मिलता
जाएगा । असंतोष या अपराध दुर् होते
जाएंगे ।

🖊 लेखक

दासाभास डा गिरिराज नांगिया

LBW - Lives Born Works at vrindabn

Friday, 18 August 2017

Dasabhas Lekhni Part 3

Dasabhas Lekhni Part 3


🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒
           दासाभास लेखनी
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💎 भाग 3⃣

1⃣ होली के साथ साथ प्रिया प्रियतम की झूलन लीला भी निकुंज में नित्य होती है।

2⃣ जिसके पास एक सौ रुपये की पूंजी नहीं, धन नहीं उसका शनि ग्रह बिगाड़ेगा तो क्या बिगाड़ेगा ऐसे ही जो भजन की एबीसीडी जानता नहीं, भजन करता नहीं, भक्ति का परिचय नहीं, केवल निंदा ही निंदा; तो उसका अपराध बिगाड़ेगा भी तो क्या ? भजन हो तो ही तो कुछ बिगड़ेगा। क्या सोचते हैं आप?

3⃣ विरक्ति या वैराग्य केवल बाबा जी या विरक्तों के लिए नहीं है संसारी, गृहस्थी व्यक्ति को भी धीरे धीरे विरक्ति - वैराग्य का अभ्यास करना चाहिये।

🔔 ।। जय श्री राधे ।। 🔔
🔔 ।। जय निताई  ।। 🔔

🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Thursday, 15 September 2016

क्या करना । क्या नही करना

​​​​✔  *क्या करना । क्या नही करना *    ✔

▶ भक्ति रसामृत सिंधू बिंदु में भक्ति के 64 अंग बताए गए हैं । जिनमें से पहले 10 अंग ऐसे हैं जो करने हैं

▶ पहला है गुरु पादआश्रय अर्थात शिक्षा और दीक्षा गुरु धारण करना ।

▶ दूसरा है इन गुरुदेव से भजन की शिक्षा प्राप्त करना

▶ तीसरा है गुरुदेव की सेवा करना ।

▶ चौथा है जिन साधनों से हमारे पूर्ववर्ती आचार्य ने भक्ति की है उन्ही साधनो का पालन करना मनमानी नहीं करना

▶ पांचवा है भजन के बारे में गुरुजनों से एवं श्रेष्ठ सजातीय वैष्णवों से प्रश्न करना

▶ छठा है कृष्ण भजन के लिए सुख सुविधा जिव्हा का रस आदि का त्याग करना

▶ सातवां है धार्मिक एवं सात्विक नगरों में वास करना

▶ आठवां है भजन बनता रहे इसके लिए भोजन आदि स्वीकार करना

▶ नोवां है एकादशी व्रत और दसवां है
आवला तुलसी पीपल आदि गो  ब्राह्मण का सम्मान

▶ यह दस अंग भक्ति के द्वार कहे हैं । यह  स्वयं सिद्ध भक्ति नहीं है ।

▶ इन से होकर भक्ति तक जाना पड़ता है । इसके बाद 10 ऐसी चीजें कहीं हैं जो एक भक्त को नहीं करनी है

▶ पहला है असाधु संग त्याग

▶ दूसरा है अधिक शिष्य करण त्याग । अर्थात बहुत शिष्य या बहुत बड़ा अपना फेन फॉलोवर्स नहीं बनाना

▶ तीसरा है सांसारिक आरंभों का त्याग । कोई नया सांसारिक प्रोजेक्ट शुरू नहीं करना

▶ चौथा है शास्त्रों की व्याख्या और विवाद का त्याग

▶ पांचवा है व्यवहार में कंजूसी का त्याग

▶ छथा है शोक और क्रोध का त्याग

▶ सातवां है अन्य अन्य देवताओं की निंदा का त्याग

▶ आठवां है प्राणी मात्र के प्रति हिंसा या उद्वेग का त्याग

▶ 9वां है सेवा अपराध एवं नाम अपराधों का त्याग

▶ और 10 वां है गुरु । कृष्ण । भक्त । शास्त्र की निंदा के सहन का त्याग ।

▶ अर्थात हमारी कोई निंदा करे तो दैन्य दिखाना भी है और सहन करना भी है । लेकिन यदि कोई हमारे गुरुदेव । हमारे शास्त्र । हमारे इष्ट की निंदा करें तो सहन नहीं करना है

▶ देश काल परिस्थिति के अनुसार उसका विरोध
करना ही ह ।

▶ इस प्रकार भक्ति के भवन में प्रवेश करने के बाद इन 10 बातों का त्याग होने के पश्चात ही भक्ति का आचरण शुरू होता है

▶ यदि इन बातों पर लापरवाही हुई तो भक्ति प्रारंभ होने में अभी देर लगेगी ओर ये भी ध्यान रहे ये सब साक्षात भक्ति नहीं हैं । ये भक्ति के लिए योग्यताएं एलिजिबिलिटी हैं । इतना हम यदि कर रहे हैं तो अभी प्री एंट्रेन्स चल रहा है ।

▶ अतः आत्म निरीक्षण करते रहें हम लोग

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

क्या करना । क्या नही करना

Saturday, 13 August 2016

अपना ध्यान रखिये

अपना ध्यान राखिये
आप या हम
जब बीमार पड़ते हैं ।
तो हमे जितना कष्ट होता है  ।
उससे अनेक गुना कष्ट
हमारे आस पास के परिवारी
जनों को होता ह ।
हमारे कारण किसी को
कष्ट न हो । यह भावना रखते
हुए सदा ही चेष्टा सहित अपने
शरीर का ध्यान रखें । लापरवाही न करें ।
 समय पर दवा
एवम् भोजन का ध्यान रखें ।
इसमें भावना दूसरों के कष्ट की ।
अपनी सुंदरता या
बुड्ढे होने का भय नही ।
शरीरमाद्यम् खलु धर्म साधनम्
शरीर से ही भजन होता है ।
और आप ध्यान से नओट करें
की सबसे पहले कुछ  छूटता है तो भजन ।

अतः भजन के लिए
एवम् दूसरों को कष्ट न हो ।
ये भावना रखते हुए सदा अपने
को स्वस्थ रखें
अपना ध्यान राखिये


Friday, 29 July 2016

विरोध



👺 विरोध 👺

🤕परत्येक मनुष्य को अपने जीवन में विरोध का सामना करना पड़ता है । यह स्वाभाविक ही है यह मत न मिलने के कारण होता है और सृष्टि तो क्या । नगर तो क्या ।  परिवार तो क्या  । घर के भाई बहन। पति पत्नी भी एकमत बहुत मुश्किल से होते हैं।

😯ऐसे में हम जो कहते हैं उसका, अनुकूलता ना होने पर दूसरा व्यक्ति विरोध करता है ।

👶कोई नया व्यक्ति है हम उसके स्वभाव को नहीं जानते हैं तो हम उसके विरोध स चोंकतेे हैं । यहां तक तो बात ठीक है

👮लकिन यदि मेरा पति या मेरी पत्नी जो बीसियों वर्ष से मेरे साथ रह रहा है और मुझे पता है कि मेरी इन इन बातों का यह विरोध करते हैं या विरोध करना इनका स्वभाव ही है

🎅तो हमें इस बात को हृदय से स्वीकार कर लेना चाहिए और हर समय तैयार रहना चाहिए कि अमुक व्यक्ति को इस बात का विरोध करेगा ही

😳अपितु चौकना तब चाहिए जब वह विरोध ना करें ।

😫विरोध को सहन करना और दुखी होना । क्योंकि सहन करने का अर्थ है कि हम उसको स्वीकार नहीं कर रहे हैं । सहन करने पर दबाव घुटन दुख होना स्वाभाविक है

😱परारंभ में सहन किया जाता है उसके बाद स्वीकार किया जाता है । यदि हम व्यक्ति के स्वभाव को स्वीकार कर ले तो हम कभी भी दुखी नहीं होंगे कभी भी घुटन या दबाव महसूस नहीं करेंगे

💩यह बात यद्यपि लौकिक और लाइफ स्टाइल से संबंधित है लेकिन अपने घर में रहने वाले व्यक्तियों सदस्यों के स्वभाव को यदि हम स्वीकार कर लें

😷और अपनी वृति को भजन में लगा लें तो भजन की चंचलता मन का इधर-उधर भटकना परिवार के लोगों के प्रति द्वेष भाव परिवार के लोगों के प्रति शिकायत हमेशा के लिए दूर हो जाएगी

😾और हम वैष्णव लोग निश्चिंतता से अपने भजन में शांति पूर्वक एकाग्रता पूर्वक लगे रहेंगे और परिवार के लोग अपने स्वभाव के अनुसार जो करना है करते रहेंगे

🤖उससे हमारे चित्त पर कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा आवश्यकता है जो जैसा है उसको वैसा ही स्वीकार करने की।

😹अजमा कर देखिए अंतर आएगा 😹

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
LBW - Lives Born Works at vrindabn


विरोध

Tuesday, 26 July 2016

भजन आत्मा का विषय है

✅   *भजन आत्मा का विषय है *   ✅

3⃣ तीन विषय हैं

1⃣ आधिदैविक जिसमें देवताओं से संबंधित विषय कार्यकलाप होते हैं

2⃣ आधिभौतिक इसमें भूत । यानी प्राणी । प्राणी यानी मानव । यानी लौकिक विषयों के बारे में वर्णन होता ह

3⃣ तीसरा है आध्यात्मिक । जैसाकि शब्द से ही स्पष्ट है इसमें आत्मा के बारे में कार्यकलाप एवं वर्णन होता है

🚼 चाहे करने वाला शरीर ही होता है और सब कुछ इसी संसार में ही होता है लेकिन होता आत्मा के लिए है

🚺 जो आत्मा विभिन्न शरीर धारण करके विभिन्न योनियों में भटकती है उसके भटकाव को रोककर सदा सदा के लिए उसे कृष्ण चरण सेवा में लगा देने से संबंधित जो भी होता है वह आध्यात्मिक होता है वह भजन होता है

♿️ इसलिए क्योंकि इसका विषय आत्मा है । आत्मा न ब्राह्मण होता है न शूद्र होता है ना वैश्य होता है ना क्षत्रिय होता है आत्मा इन चारों वर्णों का शरीर धारण करता है

❇️ और भजन या आध्यात्मिक शरीर से संबंधित नहीं है इसलिए चैतन्य चरितामृत में कहा गया कृष्ण भजने नहीं जाती कुल आदि विचार

✳️ किसी भी जाति का व्यक्ति भजन कर सकता है साथ ही किवा विप्र किवा शूद्र न्यासी केने न्य जेई श्री कृष्ण तत्ववेत्ता से गुरु हय

☢ गरु भी जरूरी नहीं कि ब्राह्मण हो कोई भी क्यों ना हो श्री कृष्ण तत्व को यदि जानता है तो वह गुरु हो सकता है क्योंकि भजन भजन भजन भक्ति या आत्मा इन सब चीजों से परे है

📛 इसीप्रकार जो पाप है वह शरीर द्वारा किया जाता है और शरीर को भोगना पड़ता है अपराध भजन में होते हैं वह आत्मिक होते हैं आत्मा को कुछ नहीं भोगना पड़ता इसीलिए केवल प्रगति में बाधा बन कर रह जाते हैं और उन्हें दूर करना पड़ता है

💯 अतः हम सब समझे रहे की भजन आत्मा की खुराक है और परोपकार सदाचार आदि यह शरीर की खुराक है

🆎 हम प्रयास करके भजन द्वारा इस आत्मा को सदा सदा के लिए शरीरों के बंधन से छुड़ाकर कृष्ण चरण सेवा के बंधन में बांध दें

⭕️ इसीलिए इस पथ को आध्यात्मिक कहा जाता है


🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
LBW - Lives Born Works at vrindabn


भजन आत्मा का विषय है


Monday, 25 July 2016

निरपेक्ष

🔴 निरपेक्ष 🔴

📍निरपेक्ष न हैले न हय भजन 📍

🍎अर्थात निरपेक्ष हुए बिना भजन नहीं होता है कोई भी अपेक्षा रही तो भजन शुरू ही नहीहोना

अपेक्षा अर्थात

🔴अरे अभी क्या है अभी हम थोड़े बुजुर्ग हो जाए हमारी भजन करने की उमर तो हो तब हम भजन करेंगे यह आयु की अपेक्षा

🔴अरे इस घर में झंझट में भजन थोड़ी होता है थोड़ी शांति हो तब भजन करेंगे

🔴अरे अभी तो हम खाते पीते हैं यह खाना-पीना छूटे तब भजन करेंगे

🔴अरे हम वृंदावन में एक कुटिया बनवाएंगे तब वहां जाकर भजन करेंगे

🔴अरे इस झंझट में कोई भजन थोड़ी होता है भजन तो मन में करना होता है भगवान तो मन में बैठा है

🔴इत्यादि अनेक प्रकार की अपेक्षाओं की अपेक्षा करते रहना और भजन प्रारंभ ना करना यह सब बहाने हम रोज़ बनाते हैं

🔴जबकि यह शास्त्र कहता है कि जब तक हम निरपेक्ष नहीं होंगे तब तक भजन प्रारंभ ही नहीं होगा

🔴विशेषकर भजन प्रारंभ करने के लिए हमें सारी अपेक्षाओं को एक किनारे रख कर भजन को तुरंत किसी भी रुप में प्रारंभ कर देना चाहिए

🔴 भजन के प्रभाव से नाम के प्रभाव से श्रद्धा के प्रभाव से सत्संग के प्रभाव से हमारा भजन बढ़ता ही जाएगा हमें मार्ग मिलता ही जाएगा

🔴घर से यदि हम निकले ही नहीं तो चलेंगे क्या । घर से निकल कर चल पडे । गलत सही रास्ता जो भी होगा चलते-चलते हमें पता चल जाएगा

🔴 इसीलिए भजन प्रारंभ करने के लिए किसी समय की किसी देश की किसी अन्य परिस्थिति की इंतजार न करें जैसी भी स्थिति में है भजन तुरंत शुरू कर दें

🔴इसमें कोई अपराध भी नहीं है । किसी प्रकार के अपराध से भी प्रारंभिक अवस्था में डरना नहीं है आप शुरू तो करिए धीरे धीरे  आपके सारे विघ्न दूर होते जाएंगे धीरे धीरे सारे दुराचार छूट जाएंगे भोजन शुद्ध हो जाएगा

🔴कलेश समाप्त हो जाएंगे मंगलमय वातावरण हो जाएगा लेकिन ईमानदारी से भजन प्रारंभ करिए और कलयुग में सर्वश्रेष्ठ भजन का स्वरुप है नाम जप या नाम संकीर्तन

🔴नाम संकीर्तन से भी सहज है नाम जप वह भी माला द्वारा या काउंटर द्वारा  । अतः सारी अपेक्षाओं को छोड़कर आज ही प्रारंभ करिए

🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
LBW - Lives Born Works at vrindabn


 निरपेक्ष


Saturday, 16 July 2016

क्या पाया क्या खोया

क्या पाया क्या खोया

✅    *क्या पाया क्या खोया*    ✅  

▶ एक बिटिया । बचपन से ही भजन के संस्कार । पोस्ट ग्रेजुएट हो गई । पिता ने कहा विवाह । बोली । पिताजी विवाह का तो प्रश्न ही नहीं उठता ।

▶ अब तक उसकी एक अच्छे वैष्णव से दीक्षा भी हो गई । लग गई भजन में । विग्रहसेवा में ।ठाकुर को रिझाने में ।

▶ लेकिन यह क्या । हर महीने निषेध भरे दिनों का झंझट । 3 दिन की गड़बड़ी । तुरंत ही उसने बच्चेदानी रिमूव करवा दी । और अनवरत भजन होता रहे इसके लिए निश्चिंत हो गई ।

Sunday, 3 July 2016

संतान कैसी



✅   संतान कैसी ✅  

संतान यदि अनुकूल न हो तो हम लोग संतान को ही दोष देते हैं लेकिन हमारी संतान कैसी है इसका बहुत सारा प्रभाव हमारे ही आचरण पर पड़ता है

🔷 नारायणी की माता श्रीवास पंडित की भतीजी

🔷श्रीवास पंडित पंचतत्वों में से एक

🔷महाप्रभु जी का अव्शिष्ट खाने वाली

🔷बृज लीला की किल अंबिका

🔷स्वयं महाप्रभु ने उच्छिष्ट पान दिया

🔷स्वयं महाप्रभु ने उसको रोकर दिखवाया कृपा की और

🔷वह विवाहित होने के बाद शीघ्र ही विधवा हो गई और महाप्रभु एवं श्रीवास के आश्रय में ही रही ।

🔷जिसने जीवनभर महाप्रभु का संकीर्तन सुना और उच्छिष्ट खाया उसका पुत्र फिर वृंदावनदास ठाकुर जैसा नहीं होगा तो कैसा होगा

🔴🔵मेरा आज यह बात कहने का मकसद यह है कि जब महिलाएं गर्भवती हो तो अपने बालक के लिए

🔺अपना आचरण
🔺अपना भजन
🔺अपना भोजन
🔺अपना चरित्र
🔺अपना सब कुछ

🔵यदि शुद्ध रखेंगे तो बालक अच्छा होगा संस्कारवान होगा और

🔴 यदि इन बातों का ध्यान नहीं दिया गया तो बालक अच्छा नहीं होगा और

🔷उसके लिए दोषी होंगे आप और हम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
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संतान कैसी