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Tuesday, 28 November 2017

Hamara Target Kya



✔ *हमारा टारगेट क्या* ✔

↪सृष्टि में विविधता है और विविधता सृष्टि का प्रथम महत्वपूर्ण गुण है । दो पत्ता भी एक सा नहीं है दो मनुष्यों की शक्ल भी एक सी नहीं है ।

 ↪इसी विविधता के कारण कुछ मनुष्य सदाचार परोपकार स्वधर्म पालन में लगे हुए हैं और उनका टारगेट संभवत यश है ।

↪कुछ मनुष्य धनोपार्जन में लगे हुए हैं येन केन प्रकारेण धनोपार्जन करना उनका टारगेट धन है।

 ↪कुछ मनुष्य येन-केन-प्रकारेण अपनी कामनाओं की पूर्ति में लगे हुए हैं यह कामना यह वासना यह इच्छा वह इच्छा ।

↪कुछ लोग ऐसे हैं जो इस जीवन के दुखों से परेशान हो गए हैं वह इस संसार में बार-बार आने जाने से मोक्ष चाहते हैं ।

↪इन सब के अतिरिक्त हम आप जैसे कुछ लोग हैं जो भक्ति में लगे हुए हैं भजन में लगे हुए हैं कृष्ण चरण सेवा चाहते हैं भगवान की कृपा चाहते हैं भगवान की कृपा से भगवान की चरणों की परमानेंट सेवा चाहते हैं ।

↪अब बात यह है कि जो जो चाहते हैं उस में लगे हुए हैं हम लोग यदि भजन भक्ति चाहते हैं तो हम यह समझ लें कि हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य है भजन । भक्ति । हमारा जीवन, कम से कम हमारा जीवन भजन भक्ति के लिए मिला है ।

 ↪और यदि भजन भक्ति के लिए जीवन मिला है तो सबसे अधिक प्राथमिकता हम भजन भक्ति को दें अधिक समय भजन भक्ति को दें और संसार में जो दायित्व हमारे ऊपर हैं उन्हें अनासक्त होते हुए निभाते रहे और संतुलन रखें । जो विभिन्न विषयों में संतुलन रखकर साधते हुए चलता है वही साधु है ।

↪फिर भी जैसे किसी का टारगेट धन है किसी का टारगेट यश है किसी का टारगेट कामना है किसी का टारगेट मोक्ष है । हमारा टारगेट भजन है, भक्ति है ।

↪यह सदा स्मरण रहे तो हमारे प्रयास भी इस ओर अधिक से अधिक होने लगेंगे ।

जय श्री राधे जय निताई
समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

Tuesday, 24 October 2017

Paap nahi hota


🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳

✔ *पाप नहीं होता* ✔

➡ भजन, भक्ति में नियमों का
पालन न करने से कोई पाप
नहीं होता है, जिसका कोई
अलग से फल भोगना पड़ता हो

➡ भजन, भक्ति में अपराध होता है
अपराध के कारण भजन, भक्ति की
गति में बाधा या असंतोष होता है, जो कि
भजन से ही मार्जित या दुर् होता
जाता है, विशेषकर नामजप से ।

➡ नाम जप प्रारम्भ में योग्य बनाता है,
फिर साधन बनता है, फिर साध्य बन
जाता है । ये तीन अलग अलग नहीं,
नाम वही एक ही है, बचपन, जवानी
बुढापे जैसी स्थिति है ।

➡ अतः जैसे भी बन पड़े, भजन अंगों को
आज से ही शुरू कर दो, निष्ठा एवं
भाव पूर्वक लगे रहो । भजन के प्रभाव से
ही शुद्ध होता जाएगा, मार्ग मिलता
जाएगा । असंतोष या अपराध दुर् होते
जाएंगे ।

🖊 लेखक

दासाभास डा गिरिराज नांगिया

LBW - Lives Born Works at vrindabn

Monday, 11 September 2017

Dasabhas Lekhni Part 4

Dasabhas Lekhni Part 4


🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒🖋🗒
             दासाभास लेखनी
✉️ ✉️ ✉️ ✉️ ✉️ ✉️ ✉️ ✉️ ✉️

💎 भाग 4⃣

1⃣ जब जब यह कहा जाता है कि भक्ति अति दुर्लभ है एक कठिन कोर्स है। अभी तो हम पहली दूसरी कक्षा में हैं - इसका आशय निराश करना नहीं, इसका आशय उत्साहित करना है कि हम अच्छा कार्य कर रहे हैं लेकिन बहुत कम है। और आगे बढ़ो। और लगे रहो। धैर्य और उत्साह सहित भजन भक्ति में असंतोष एवं और और और अधिक की कामना सदा बनी रहे .

2⃣ कामगंध हीन स्वाभाविक गोपी प्रेम।
निर्मल उज्ज्वल शुद्ध येन दुग्ध हेम।।
कृष्णेर सहाय, गुरु, बान्धव, प्रेयसी।
गोपिका हयेन प्रिया, शिष्या, सखी, दासी।।
गोपिकाऔं का श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम स्वभाव वश ही है। यह स्वसुख की गन्ध से भी रहित है। तपाये हुए शुद्ध सोने की तरह यह निर्मल, उज्ज्वल एवं विशुद्ध है। गोपिकाएं श्रीकृष्ण की रासलीला, निकुंज आदि में सहायता करने से सहायक हैं। प्रेम की शिक्षा देने से वे गुरु हैं। श्रीकृष्ण प्रीति के लिए सब करती हैं तो बांधव हैं। श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण समर्पण से सेवा करती हैं शरीर सहित अतः प्रेयसी हैं। वे सदा कृष्ण आज्ञा पालन करती हैं अतः शिष्या हैं। वे हर दुख सुख की संगिनी हैं अतः सखी हैं। सदा श्रीकृष्ण सेवा में रहने से वे उनकी दासी हैं। गोपीप्रेमामृत ग्रंथ में श्रीकृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर यही जवाब दिया - सहायाः गुखः शिष्या भुजिष्या बान्धवाः स्त्रियः। सत्यं वदामि ते पार्थः गोप्यः किं न भवन्ति मे।। मेरी सहायक । गुरु। शिष्या। भोग्या। बान्धव। कान्ता। सत्य तो ये है कि मैं नहीं जानता - कि वे मेरी क्या नहीं हैं। मेरी महिमा। मेरी सेवा। मेरा अभीष्ट। एवं मेरे मन की बात को गोपिया यथारूप में बिना कहे जानती हैं। और उन सब गोपी गणों में उत्तम और प्रमुख हैं - श्रीराधा।
   श्री चैतन्य चरितामृत आदि।4। 173 से 176।

🔔 ।। जय श्री राधे ।।🔔
🔔 ।। जय निताई  ।। 🔔

🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Saturday, 30 July 2016

सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर भाग 22

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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
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 🔮 भाग 22

💡 दुष्ट व्यक्ति ईमानदार है
वह अपनी दुष्टता
कभी नहीं छोड़ता
ऐसे ही
सज्जन व्यक्ति को भी
अपनी सज्जनता
छोड़नी नहीं चाहिए

💡 भक्ति : सबसे कठिन
यदि वह श्री कृष्ण प्रेम प्राप्ति
के लिए की जाए
भक्ति : सबसे सरल
यदि वह पलायन अथवा
दिखावे के लिए की जाए

💡 साईं इतना दीजिए
जामे कुटुम्ब समाय
मैं भी भूखा ना रहूं
साधु न भूखा जाए
हे प्रभु बस इतना ध्यान दीजिए जिसमें मेरे
परिवार का पालन पोषण हो जाए और
यदि कोई साधु द्वार पर आ जाए तो वह
भी भूखा ना जाए। अतः धन की कामना
सिमित रखे. अत्याधिक धन सब अनर्थो
की जड़ है और भयंकर उत्पातकारी है.

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
LBW - Lives Born Works at vrindabn



Monday, 20 June 2016

सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर भाग 7

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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺

 🔮 भाग 7

💡 दान देने मात्र से दान का
पुण्य मिलने वाला नही है.
योग्य व्यक्ति को दिया गया दान
नशेडी व् जुआ खेलने वाले व्यक्ति को दिया गया दान
मांस मदिरा सेवन करने वाले को दिया गया दान
भगवत भजन न करने वाले को दिया गया दान 
आवश्यकता न होने पर दिया गया दान
व्यर्थ है. बल्कि उसके पाप के कुछ अंश का
भागीदार दान देने वाला भी बनेगा. सावधान.

💡 यंहा तक की यदि किसी ने
मांसाहारी होटल के लिए
मकान या दुकान
किराये पर दिया है, तो उस
मकान मालिक
को भी पशु हत्या के पाप का
भागीदार निश्चित
बनना पड़ेगा.
यह अटल सत्य है.
   
💡 भक्ति एवं भजन का प्रदर्शन
करना अपराध है.
इसका प्रचार करने से इसमें कमी तो
आती ही है अहंकार भी पुष्ट होता है.
इसलिए जितना हो सके इसे
गोपन करना चाहिए.
वैष्णव लोग झोलीमाला में माला जपते
है तो उसको भी वस्त्र में छिपा कर रखते है.

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚



🖊  लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर भाग 7

Tuesday, 12 June 2012

216. jeevakah




जीवक:

श्री जीव गोस्वामी ने अपनी भक्ति - जात दीनतावश अपने आपको 
जीवक: लिखा - अर्थात कोई एक सामान्य सा जीव |

लेकिन श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती पाद ने 
जीवक: की व्याकरण सम्मत व्याख्या की 
कि जिन्होंने अपने आचरण द्वारा अपने द्वारा रचित दर्शन ग्रन्थ
व्याकरणआदि रचनाओं के द्वारा जीवों को जीवन दान 
दिया - वह जीवक = यानी जीवों को अपनी 
करुना द्वारा जीवनदान देने वाले | 
-- 

JAI SHRI RADHE

jeevakah

Sunday, 9 October 2011

108. प्रभु कृपा के दर्शन : समीक्षा



प्रभु कृपा के दर्शन : समीक्षा


१. हमारे आस पास जो भी है, हो रहा है, जो भी 
    सुख, श्रेष्ठता है, सभी मै प्रभु की ही कृपा के दर्शन करो 
    समीक्षा करो कि प्रभु ने कितनी कृपा कि है कि हम इस लायक वने है 

२. जो इस प्रकार सदा सर्वदा उनकी कृपा को ही 
    सब कुछ का कारण मानता है, 
    उसके द्वारा किये हुए अगले पिछले जन्मो के पाप भुंज जाते हैं अपना 
    फल नहीं देते - जबकि सिद्धांत है कि " अवश्यमेव भोकन्यं कृतं 
    कर्म शुभाशुभं 

३. ह्रदय से, वाणी से, शरीर से सदैव जो विधिपूर्वक,  
    सिस्टम को फोलो करते हुए सदैव प्रभु को इस भाव से नमस्कार,
    प्रणाम, सेवा करता है 

४. वह स्वत: ही "भक्ति" का उत्तराधिकारी बन जाता है, भक्ति 
    करने कि योग्यता प्राप्त कर उसे भक्ति सहज ही प्राप्त हो जाती है 
    ठीक वैसे, जैसे पिता कि सम्पत्ति स्वत: ही संतान को मिल 
    जाती है - खरीदनी नहीं पड़ती 
JAI SHRI RADHE

DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
made to serve ; GOD  thru  Family  n  Humanity
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban


Saturday, 1 October 2011

86. श्री राधा जी की सौत

श्री राधा जी की सौत



✅  श्री राधा जी की सौत  ✅

▶ कुछ महिला या कन्या बिहारीजी या अन्य ठाकुर को अपना 'पति' बना देती हैं, यह रिश्ता एकतरफा नहीं हो सकता

▶ ठाकुर कभी भी किसी जीव को पत्नी रूप में स्वीकार नहीं करते न ही जीव का अधिकार है 'पत्नी' बनने का

▶एक जीव सदा ही ठाकुर का सदा-सदा से दास ही है

▶घर की एक बाई = एक सेविका किसी मालिक को बहला फुसला कर

▶अपनी सेवा के बदले में उसे अपना पति बनाना चाहे-ये कुछ ऐसा ही है,

▶ एक तो वह मालिक की पत्नी की कोप-भाजन बनेगी, और धक्का मार कर निकाल दी जायेगी-नौकरी=सेवा=भक्ति से


▶ आज का मालिक शायद बहक जाए, सबका मालिक श्री राधा जी की सौत बनने वाली को एक अपराधी ही मानते है

▶ अपराधी कभी भी भक्त नहीं हो सकता


▶ मीरा  जीव नहीं थी, वह सत्यभामा का अवतार थी

▶हम न मीरा है, न सत्यभामा, हम जीव हैं, हमारा काम सेवा करना है,

▶ पत्नी बनना,दुराचार है, व्यभिचार है,अपराध है,


▶ सेवा से वे बहुतो को मिले हैं, पति बनकर आजतक किसी जीव को न

मिले हैं, न मिलेंगे, वे अपनी नित्य पत्नियों के ही पति बनते हैं

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚

🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊  लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 

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