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Thursday, 21 July 2016

सुखालय एवम् दुखालय

😂 सुखालय एवम्  दुखालय 😩

जय श्री राधे । शरीर माद्यम खलु धर्म साधनम । इस शरीर से ही धर्म और परम धर्म का साधन होता है और यह शरीर इस संसार में रहता है ।

☺️जो लोग इस संसार के अनश्वर सुखों के लिए इस शरीर और इस संसार का उपयोग करना चाहते हैं उन्हें सुखों का आभास ही प्राप्त होता है

Wednesday, 20 July 2016

दो प्रकार के भाव होते हैं

✅   *दो प्रकार के भाव होते हैं*     ✅  

▶ एक ऐसा भाव होता है जिसको *तदीयता भाव*  बोलते हैं अर्थात मैं *तुम्हारा* हूं अर्थात तुम्हारे *शरणागत* हूं

▶ अब तुम मुझे सुख दो । दुख दो। मारो । रक्षा करो । मेरा ध्यान रखो। रखो ना रखो । मारो । बचाओ । जो भी करना है आपने करना है

▶ हे प्रभु मैं तो बस आपके पास आ गया। मैं अब तुम्हारा बन गया । मैं अब संसार का नहीं हूं । यह भाव भी बहुत श्रेष्ठ है । लेकिन इससे और भी श्रेष्ठ भाव है *मदीयता का भाव*

▶ मदीयता भाव मैं । हे प्रभु अब तुम मेरे हो। मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगा । तुम्हारे सुख की चिंता करुंगा । तुम्हारी सेवा करूंगा । तुम्हें यथासंभव प्रसन्न रखूंगा ।

▶ इस भाव में अपने बारे में कोई सोच ही नहीं है कि तुम मेरा ध्यान रखना या मुझे दुखी करना या सुखी करना । हित करना । यह सब नहीं है

▶ *तदीयता भाव*  में ठीक है प्रभु के प्रति समर्पण तो है लेकिन कहीं ना कहीं अपनी सारी जिम्मेदारियां प्रभु पर थोप देने का भाव है ।

▶ केंद्र अपने ऊपर है और सेकेंडरी है प्रभु की सेवा लेकिन *मदीयता भाव* में प्रभु की सेवा ही केंद्र में है ।

▶ अपने बारे में कोई चिंता नहीं है प्रभु का ही सब प्रकार से सुख विधान करना मदीयता भाव का मूल उद्देश्य है

▶ अब जब ऐसा कोई भाव रख लेता है तो फिर प्रभु ने स्वयं कहा है *अनन्याश्चिंतयंतो मां ये जना* *पर्युपासते* जो अनन्य भाव से मेरा भजन करते हैं मैं उनकी सब प्रकार से योगक्षेम वहन करता हूं

▶ इस प्रकार *मदीयता में तदीयता*  तो अपने आप ही आ जाती है लेकिन यदि शुरुआत तदीयता से भी हो  तो साधक तदीयता के बाद मदीयता में आ ही जाता है

▶ क्योंकि यह श्रेष्ठ है इसमें जीवो के दास्य स्वरूप का सही दर्शन है और कृष्ण चरण सेवा । कृष्ण सुख प्राप्ति की ही आशा है

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
LBW - Lives Born Works at vrindabn


Monday, 11 July 2016

सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर भाग 19

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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺

 🔮 भाग 19

💡 कर्म का फल अवश्यंभावी है
चाहे कितने ही जन्मों के पश्चात
क्यों ना मिले उसका फल जीव को
अवश्य भोगना होता है। 101 जन्म
पूर्व अनजाने में एक सर्प को
कँटीली झाड़ी में फेंकने और इससे
उसके मर जाने के पाप का फल
महान भक्त भीष्म पितामह को
अंतिम अवस्था में शरशैया
पर पड़े रहकर रुकना पड़ा था

💡 सभी व्रत अपनी मनोकामनाओं
की पूर्ति के लिए होते हैं किंतु
एकादशी व्रत भगवान की प्रीति के
लिए है। इस व्रत का लक्ष्य है
अधिक भजन ।शरीर हल्का रहे.
आलस्य ना आए, निंद्रा ना आए,
इसलिए निराहार रहें या केवल
जल पीकर अथवा फलाहार करके
भजन करना चाहिए। मूल में
भजन है ना कि- क्या खाएं -
क्या न खाएं इसी में उलझे रहें।

💡 श्रीमद्भागवत गीता में
भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा है
जो भी मेरी पूजा छोड़कर
अन्य अन्य देवी देवताओं की
पूजा करता है, वह भी
एक प्रकार से मेरी ही पूजा करता है
किंतु वह अविधिपूर्वक है

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
LBW - Lives Born Works at vrindabn




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Wednesday, 6 July 2016

सूक्ष्म सूत्र गागर में सागर भाग 17



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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺

 🔮 भाग 17

💡 ऋषि मुनियों और अप्सराओं का
उदाहरण देकर
सर्वदा कामिनी और कंचन की
बाते करने वाले पुरुष
महाकामी है.
साधक को इनके संग और
वार्ता से भी बचना चाहिए.

💡 मनुष्य जीवन पाकर
खाओ पीओ और मौज करो
वाला दर्शन वैसे ही है जैसे
वर्क ऑफिस में कंप्यूटर पर
ऑफिस का काम न करके
आठ घंटे गेम खेलकर
घर वापस आ जाना.

💡 मनुष्य योनी सर्वश्रेष्ठ है
केवल इसी योनी में
पिछले जन्मो के पाप-पुण्य
भोगते हुए नये कर्म
करके अपना अगला जन्म
सुखमय बना सकते है.
तो देर किस बात की है – जुट जाओ.

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
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