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Tuesday, 7 November 2017

दासाभास लेखनी भाग 7

दासाभास लेखनी


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             दासाभास लेखनी
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💎 भाग 7⃣

1⃣ ।। सब एक ही बात नहीं है ।।
अपनी साधना में जो सिद्ध हो चुके हैं ऐसे शांतरस के साधक - सिद्ध लोक को
दास्य भाव के साधक - वैकुण्ठ लोक को
शुद्ध सख्य- वात्सल्य- मधुर भाव के साधक गोलोक में जाते हैं। उपासना एवं भाव से अलग-अलग लोकों की प्राप्ति होती है.

2⃣ आम आदमी सांप को मार सकता नहीं। सपेरा मार सकता है, लेकिन मारता नहीं। उसके विषदन्त निकाल कर खेलता है ऐसे ही कामना वासना को मारो नहीं, उनमें से संसार-विषय विष निकाल कर उन्हें श्रीकृष्ण सेवा में लगा कर खेलो और आनंदित रहो.

3⃣ बन्दूक - जिस प्रकार एक गोली अपनी बन्दूक द्वारा प्रयोग करने पर ही काम करती है। उसी प्रकार मंत्र या भजन गुरुदेव द्वारा प्राप्त होने पर, उनके आनुगत्य में करने पर ही फल देता है। यदि भजन शुरू हो भी जाए तो पहले गुरुदेव मिलेंगे। फिर भजन का फल श्रीकृष्ण-सेवा मिलेगी वैसे ही जैसे यदि गोली मिल जाय तो बन्दूक खरीदनी पड़ेगी और बन्दूक मिल जाय तो गोली भी चाहिये।

🔔 ।। जय श्री राधे ।। 🔔
🔔 ।। जय निताई  ।। 🔔

🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Thursday, 15 September 2016

क्या करना । क्या नही करना

​​​​✔  *क्या करना । क्या नही करना *    ✔

▶ भक्ति रसामृत सिंधू बिंदु में भक्ति के 64 अंग बताए गए हैं । जिनमें से पहले 10 अंग ऐसे हैं जो करने हैं

▶ पहला है गुरु पादआश्रय अर्थात शिक्षा और दीक्षा गुरु धारण करना ।

▶ दूसरा है इन गुरुदेव से भजन की शिक्षा प्राप्त करना

▶ तीसरा है गुरुदेव की सेवा करना ।

▶ चौथा है जिन साधनों से हमारे पूर्ववर्ती आचार्य ने भक्ति की है उन्ही साधनो का पालन करना मनमानी नहीं करना

▶ पांचवा है भजन के बारे में गुरुजनों से एवं श्रेष्ठ सजातीय वैष्णवों से प्रश्न करना

▶ छठा है कृष्ण भजन के लिए सुख सुविधा जिव्हा का रस आदि का त्याग करना

▶ सातवां है धार्मिक एवं सात्विक नगरों में वास करना

▶ आठवां है भजन बनता रहे इसके लिए भोजन आदि स्वीकार करना

▶ नोवां है एकादशी व्रत और दसवां है
आवला तुलसी पीपल आदि गो  ब्राह्मण का सम्मान

▶ यह दस अंग भक्ति के द्वार कहे हैं । यह  स्वयं सिद्ध भक्ति नहीं है ।

▶ इन से होकर भक्ति तक जाना पड़ता है । इसके बाद 10 ऐसी चीजें कहीं हैं जो एक भक्त को नहीं करनी है

▶ पहला है असाधु संग त्याग

▶ दूसरा है अधिक शिष्य करण त्याग । अर्थात बहुत शिष्य या बहुत बड़ा अपना फेन फॉलोवर्स नहीं बनाना

▶ तीसरा है सांसारिक आरंभों का त्याग । कोई नया सांसारिक प्रोजेक्ट शुरू नहीं करना

▶ चौथा है शास्त्रों की व्याख्या और विवाद का त्याग

▶ पांचवा है व्यवहार में कंजूसी का त्याग

▶ छथा है शोक और क्रोध का त्याग

▶ सातवां है अन्य अन्य देवताओं की निंदा का त्याग

▶ आठवां है प्राणी मात्र के प्रति हिंसा या उद्वेग का त्याग

▶ 9वां है सेवा अपराध एवं नाम अपराधों का त्याग

▶ और 10 वां है गुरु । कृष्ण । भक्त । शास्त्र की निंदा के सहन का त्याग ।

▶ अर्थात हमारी कोई निंदा करे तो दैन्य दिखाना भी है और सहन करना भी है । लेकिन यदि कोई हमारे गुरुदेव । हमारे शास्त्र । हमारे इष्ट की निंदा करें तो सहन नहीं करना है

▶ देश काल परिस्थिति के अनुसार उसका विरोध
करना ही ह ।

▶ इस प्रकार भक्ति के भवन में प्रवेश करने के बाद इन 10 बातों का त्याग होने के पश्चात ही भक्ति का आचरण शुरू होता है

▶ यदि इन बातों पर लापरवाही हुई तो भक्ति प्रारंभ होने में अभी देर लगेगी ओर ये भी ध्यान रहे ये सब साक्षात भक्ति नहीं हैं । ये भक्ति के लिए योग्यताएं एलिजिबिलिटी हैं । इतना हम यदि कर रहे हैं तो अभी प्री एंट्रेन्स चल रहा है ।

▶ अतः आत्म निरीक्षण करते रहें हम लोग

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

क्या करना । क्या नही करना

Thursday, 22 March 2012

196. BEL KA PHAL



बेल का फल 

पेड़ से गिरा हुआ  बेल का फल आँगन में पड़ा हो.
तो  कोई भी बालक उसे उठाकर 
स्वाभाविक ही मुंह में डालता है.

ऐसा करने से

१.उसके दाँत टूटेंगे 
२. मुंह में खून आएगा 
३. पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा .लाभ के बजाय हानि होगी 

यदि उसी फल को वह अपनी माता-पिता को लाकर दे 
तो माता उसे छील-छाल कर 
उसका बढ़िया रस उस बालक को पिलाएगी. 
परिणामत न दाँत टूटे, न खून
निकला अपितु आनंद एवं बल वृद्धी होगी.

इसी प्रकार बालक-साधक या प्रारंभिक साधकों को 
अपने गुरुदेव, वरिष्ठ संत विद्वानों के आश्रय 
में, अनुमति में, मार्गदर्शन में, साधनों का अनुष्ठान, 
ग्रंथों का अध्यन करना चाहिए.
अन्यथा वही हाल होगा जो बालक का होता है.

फिर लोग शिकायत करते है की आप तो कहते हो ये फल है, 
लेकिन इसके खाने से तो मेरे दन्त टूट गए.

JAI SHRI RADHE
DASABHAS Dr GIRIRAJ नांगिया

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Friday, 21 October 2011

118. GALAT PRANAM = KUSHTHA

GALAT PRANAM = KUSHTHA



गलत प्रणाम से कुष्ठ रोग होता है !!!


१.मंदिर में ठाकुर को अपने बाये रखकर प्रणाम करना चाहिए 

२. हमेशा पंचांग प्रणाम करना चाहिए

३. पूरा लेट कर प्रणाम करना हो तो कमर से ऊपर के 
वस्त्र पूरे उतार देने चाहिए