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दासाभास लेखनी
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💎 भाग 4⃣
1⃣ जब जब यह कहा जाता है कि भक्ति अति दुर्लभ है एक कठिन कोर्स है। अभी तो हम पहली दूसरी कक्षा में हैं - इसका आशय निराश करना नहीं, इसका आशय उत्साहित करना है कि हम अच्छा कार्य कर रहे हैं लेकिन बहुत कम है। और आगे बढ़ो। और लगे रहो। धैर्य और उत्साह सहित भजन भक्ति में असंतोष एवं और और और अधिक की कामना सदा बनी रहे .
2⃣ कामगंध हीन स्वाभाविक गोपी प्रेम।
निर्मल उज्ज्वल शुद्ध येन दुग्ध हेम।।
कृष्णेर सहाय, गुरु, बान्धव, प्रेयसी।
गोपिका हयेन प्रिया, शिष्या, सखी, दासी।।
गोपिकाऔं का श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम स्वभाव वश ही है। यह स्वसुख की गन्ध से भी रहित है। तपाये हुए शुद्ध सोने की तरह यह निर्मल, उज्ज्वल एवं विशुद्ध है। गोपिकाएं श्रीकृष्ण की रासलीला, निकुंज आदि में सहायता करने से सहायक हैं। प्रेम की शिक्षा देने से वे गुरु हैं। श्रीकृष्ण प्रीति के लिए सब करती हैं तो बांधव हैं। श्रीकृष्ण की सम्पूर्ण समर्पण से सेवा करती हैं शरीर सहित अतः प्रेयसी हैं। वे सदा कृष्ण आज्ञा पालन करती हैं अतः शिष्या हैं। वे हर दुख सुख की संगिनी हैं अतः सखी हैं। सदा श्रीकृष्ण सेवा में रहने से वे उनकी दासी हैं। गोपीप्रेमामृत ग्रंथ में श्रीकृष्ण ने अर्जुन के पूछने पर यही जवाब दिया - सहायाः गुखः शिष्या भुजिष्या बान्धवाः स्त्रियः। सत्यं वदामि ते पार्थः गोप्यः किं न भवन्ति मे।। मेरी सहायक । गुरु। शिष्या। भोग्या। बान्धव। कान्ता। सत्य तो ये है कि मैं नहीं जानता - कि वे मेरी क्या नहीं हैं। मेरी महिमा। मेरी सेवा। मेरा अभीष्ट। एवं मेरे मन की बात को गोपिया यथारूप में बिना कहे जानती हैं। और उन सब गोपी गणों में उत्तम और प्रमुख हैं - श्रीराधा।
श्री चैतन्य चरितामृत आदि।4। 173 से 176।
🔔 ।। जय श्री राधे ।।🔔
🔔 ।। जय निताई ।। 🔔
🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn
