Saturday, 11 November 2017

Bihari Ji Mandir me kyo hota hai parda baar baar

क्यों करते है बिहारी जी मन्दिर में बार बार पर्दा

धन्यवाद!!
जय श्री राधे !!
जय निताई !!
श्री हरिनाम प्रेस, वृन्दावन ।।
www.shriharinam.com
संतो एवं मंदिरो के दर्शन के लिये एक बार जरूर visit करे ।।।

Tuesday, 7 November 2017

दासाभास लेखनी भाग 7

दासाभास लेखनी


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             दासाभास लेखनी
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💎 भाग 7⃣

1⃣ ।। सब एक ही बात नहीं है ।।
अपनी साधना में जो सिद्ध हो चुके हैं ऐसे शांतरस के साधक - सिद्ध लोक को
दास्य भाव के साधक - वैकुण्ठ लोक को
शुद्ध सख्य- वात्सल्य- मधुर भाव के साधक गोलोक में जाते हैं। उपासना एवं भाव से अलग-अलग लोकों की प्राप्ति होती है.

2⃣ आम आदमी सांप को मार सकता नहीं। सपेरा मार सकता है, लेकिन मारता नहीं। उसके विषदन्त निकाल कर खेलता है ऐसे ही कामना वासना को मारो नहीं, उनमें से संसार-विषय विष निकाल कर उन्हें श्रीकृष्ण सेवा में लगा कर खेलो और आनंदित रहो.

3⃣ बन्दूक - जिस प्रकार एक गोली अपनी बन्दूक द्वारा प्रयोग करने पर ही काम करती है। उसी प्रकार मंत्र या भजन गुरुदेव द्वारा प्राप्त होने पर, उनके आनुगत्य में करने पर ही फल देता है। यदि भजन शुरू हो भी जाए तो पहले गुरुदेव मिलेंगे। फिर भजन का फल श्रीकृष्ण-सेवा मिलेगी वैसे ही जैसे यदि गोली मिल जाय तो बन्दूक खरीदनी पड़ेगी और बन्दूक मिल जाय तो गोली भी चाहिये।

🔔 ।। जय श्री राधे ।। 🔔
🔔 ।। जय निताई  ।। 🔔

🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Sunday, 5 November 2017

Shri Ram Shri Krishan


श्रीराम श्रीकृष्ण

श्री राम हों या श्री कृष्ण हों, वामन हों,  नृसिंह हों, या श्री कृष्ण के अनेक स्वरुप श्री राधारमण हों, श्री बिहारी जी हों, श्री राधावल्लभ हों, श्री गोविंद देव आदि हों, यह सब एक ही स्वरुप है।

यह सब एक ही हैं । इनमें तत्वतः कोई भेद नहीं, ठीक वैसे जैसे बीए हो, बीकॉम हो, बीएससी हो बीसीए हो यह सभी ग्रेजुएट डिग्रियां हैं ।

लेकिन जब हम निश्चित कर लेते हैं कि हमें बीकॉम करना है तो हम बी कॉम की कक्षा में जाते हैं, बीकॉम की पुस्तकें पढ़ते हैं, बीकाम की ही कोचिंग लेते हैं और बीकॉम में पढ़ने वाले अपने साथियों का संग करते हैं ।

इसका अर्थ बीसीए या बीएससी की निंदा नहीं, उपेक्षा नहीं लेकिन केंद्र एक पर ही है ।

थोड़ा-थोड़ा अंतर भी इनमें होता है । बीकॉम करने वाला कभी डॉक्टर नहीं बन सकता । इसलिए उपासना के रूप में जब हम इन भगवान के विभिन्न स्वरूपों को देखते हैं तो यहां भी थोड़ा थोड़ा अंतर है ।

नरसिंह की उपासना और कृष्ण की उपासना और श्री राम की उपासना तीनों में अंतर है और उपासना के फल में भी अंतर है ।

श्रीकृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं
राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और
नरसिंह ने प्रहलाद की रक्षा की

इसलिए जब हम दीक्षित हो गए तब इष्ट रूप में हमें अपने गुरु परंपरा से प्राप्त श्री विग्रह के स्वरूप को ही सदा देखना चाहिए ।

उसी विषय के ग्रंथ पढ़ने चाहिए , उसी विषय के वैष्णवों का संग करना चाहिए, अपमान तो प्राणी मात्र का नहीं करना है फिर यह सब तो भगवान है ।

जब तक उपासना में अनन्यता नहीं आएगी तो इष्ट के प्रति दृढ़ बुद्धि एवं समर्पण नहीं आएगा और दृढ़ निष्ठा एवं समर्पण ना होने से प्राप्ति में बहुत विलंब होगा ।

अतः अनन्यता पूर्वक यथासंभव अधिक से अधिक अपने

इष्ट के विषय में बात करें ।
इष्ट के विषय में चिंतन करें ।
इष्ट का दर्शन करें
इष्ट के आचार्यों से मिले

तो हम शीघ्र ही इष्ट की कृपा प्राप्त कर उनके चरणों की सेवा प्राप्त कर लेंगे

समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚
🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Shringaar Vatt Vrindavan

Shringarvatt

✔  *श्रृंगार वट* ✔

▶ वृन्दाबन की परिक्रमा मार्ग में इम्लितला से 5वीं जीर्ण शीर्ण बिल्डिंग है । प्राचीन सिद्ध स्थान है ।

▶ यह लगभग जमुना के तट पर स्थित है । कभी इसके घाट पर यमुना जी भी बहती थी । रास लीला में जब श्री राधा जी चली गई तब श्री राधा जी का इस स्थान पर ठाकुर ने श्रृंगार किया था ।

▶ इसलिए इसका नाम श्रृंगार वट है । साथ ही जब नित्यानंद प्रभु आए तब नित्यानंद प्रभु ने भी यहां पर वास किया था ।

▶और आज भी यहां नित्यानंद प्रभु के वंशज उनके पुत्र के पुत्र के पुत्र के पुत्र यही विराजमान हैं ।

▶ श्रीनित्यानंद प्रभु के वंशज और उनके शिष्य उनका वंश आज भी श्रृंगार वट में विराजमान है

▶ श्री श्रृंगार वट सप्त देवालयों की गुरु गद्दी है । क्योंकि यह नित्यानंद प्रभु का स्थान है । सप्त देवालय गोस्वामी पाद के स्थान हैं ।  रूप,  सनातन श्री जीव श्री गोपाल भट्ट आदि ।

▶ नित्यानंद  प्रभु है । इसलिए यह गुरु गद्दी है लेकिन समय के प्रभाव से जीर्ण शीर्ण अर्थहीन ऐश्वर्य हीन होने से अब यहां कोई इसको पूछता नहीं है । स्वाभाविक भी है ।

▶ लेकिन यह स्थान सिद्ध है ।

▶प्रिया जी का यहां ठाकुर ने श्रृंगार किया है
और नित्यानंद प्रभु के यहां पर चरण पड़े हैं
नित्यानंद प्रभु के वंशज यहां आज भी विराजमान हैं

▶ यहां निताई गौर और प्रिया प्रीतम के दुर्लभ विग्रह हैं । सेवा पूजा आज भी विधि विधान से श्रद्धा पूर्वक होती है ।

▶ जो अंतरंग भक्त हैं, वैष्णव है । वह नियम से प्रतिदिन यहां दर्शन करते हैं । बहुत बड़ा प्रांगण दर्शनीय है । अवश्य दर्शन करना ही चाहिए

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Wednesday, 25 October 2017

Dasabhas Lekhni Part 6


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             दासाभास लेखनी
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💎 भाग 6⃣

1⃣ शिव जीः त्रिलोचना सखी - श्रीगौरदास जी महाराज ने चर्चा में बताया कि श्रीभक्तमाल में श्रीप्रियादास जी श्री नरसी मेहता के चरित्र में गान किया है कि एक वीहड़ में शिवलिंग की उपासना करने पर श्री शिवजी साक्षात प्रकट हुए और नरसी मेहता का हाथ पकड़ कर उन्हें भी श्री रासलीला के दर्शन कराये। वहां पर शिवजी को त्रिलोचना सखी बताया है और उनकी दीपक सेवा का वर्णन है शिवजी ने नरसी मेहता जी को भी दीपक सेवा देते हुए उन्हें सखी नाम दिया है। आदि - आदि। त्रिलोचना सखी की जय हो। ये स्थान जूनागढ़ में है। द्वारका यात्रा में इस स्थान के दर्शन भी करेंगे हम लोग।

2⃣ श्रीकृष्ण जन्म अवसर पर श्रीशिव जी नन्द भवन में दर्शन हेतु गये सम्बन्धी श्री शिवजी की जो-जो लीला प्रचलित है हम श्रवण करते हैं। वह भी श्रीमद्भागवत चै. च.। गोपाल चम्पू में नहीं है .

3⃣ किसी बात का अभिमान नहीं है यही सबसे बड़ा अभिमान है.

🔔 ।। जय श्री राधे ।। 🔔
🔔 ।। जय निताई  ।। 🔔

🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Tuesday, 24 October 2017

Paap nahi hota


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✔ *पाप नहीं होता* ✔

➡ भजन, भक्ति में नियमों का
पालन न करने से कोई पाप
नहीं होता है, जिसका कोई
अलग से फल भोगना पड़ता हो

➡ भजन, भक्ति में अपराध होता है
अपराध के कारण भजन, भक्ति की
गति में बाधा या असंतोष होता है, जो कि
भजन से ही मार्जित या दुर् होता
जाता है, विशेषकर नामजप से ।

➡ नाम जप प्रारम्भ में योग्य बनाता है,
फिर साधन बनता है, फिर साध्य बन
जाता है । ये तीन अलग अलग नहीं,
नाम वही एक ही है, बचपन, जवानी
बुढापे जैसी स्थिति है ।

➡ अतः जैसे भी बन पड़े, भजन अंगों को
आज से ही शुरू कर दो, निष्ठा एवं
भाव पूर्वक लगे रहो । भजन के प्रभाव से
ही शुद्ध होता जाएगा, मार्ग मिलता
जाएगा । असंतोष या अपराध दुर् होते
जाएंगे ।

🖊 लेखक

दासाभास डा गिरिराज नांगिया

LBW - Lives Born Works at vrindabn

Monday, 23 October 2017

Bhagwan ki Lilaen

भगवान की लीलाएं


✔ *भगवान की लीलाएं* ✔

➡ भगवान श्री कृष्ण ने जब पृथ्वी पर अवतरण किया और विभिन्न लीलाएं की तो उनके देवगण भी उनकी उस लीलाओं के दर्शन करने या अपने घर भगवान श्रीकृष्ण की पधरावनी करने का लोभ संवरण ना कर सके ।

➡ ऐश्वर्यमय सृष्टि नियंता भगवान के रूप में तो उन पर कृपा है ही । रहती ही है । लेकिन वे देवगन भी यही चाहते थे कि भगवान की नर स्वरूप लीला की भी कृपा हमारे ऊपर हो ।

➡ इसी भावना से ब्रह्मा ने गोवत्स चुराए और अंततः भगवान के उस बाल स्वरुप का दर्शन कर उनकी स्तुति कर यहां तक कि उन को कष्ट देने पर भी आनंद ही लाभ किया ।

➡ जब ब्रह्मा ने इस प्रकार किया और इंद्र ने भी भगवान के साथ कुछ गड़बड़ी की लेकिन जब उन्हें समझ आया कि यह तो मेरे स्वामी परात्पर ब्रम्ह साक्षात श्रीकृष्ण ही है ।

➡ तो इंद्र ने भी उनकी कृपा लाभ की ओर इंद्र पर भी श्री कृष्ण प्रसन्न हुए और इंद्र ने भी नर रूप श्री कृष्ण के दर्शन कर अपने आप को धन्य किया ।

➡ वरुण देवता ने भी जब देखा कि ब्रह्मा आनंद ले चुके हैं । इंद्र आनंद ले चुके हैं । तो क्यों ना मैं भी परात्पर ब्रम्ह परमात्मा के श्री कृष्ण रूप की पधरावनी अपने महल में करवाऊं । उनकी इच्छा होते ही कृष्ण ने उनकी इच्छा पूरी करने की योजना बना ली ।

➡ और एक दिन द्वादशी का पारण करने के लिए नंद बाबा ने रात्रि 3 बजे जैसे ही यमुना में स्नान हेतु प्रवेश किया तो उनको वरुण लोक् ले जाया गया ।

➡ जैसे ही कृष्ण को पता चला कृष्ण भी यमुना में प्रवेश कर वरुण लोक् चले गए वहां पाताल में वरुण या जल देवता ने श्री बाबा की तो पूजा की ही श्रीकृष्ण की भी सपरिवार पूजा की ।

➡ और अंत में वरुण ने यह कहा । प्रभु मैंने यदि आपके प्रति आपके पिता के प्रति अपराध किया है तो आप मुझे दंड दीजिए ।

➡ लेकिन मेरी हार्दिक इच्छा आप जानते हैं मैंने यह जो उत्पात् किया यह आपके चरण वरुण लोक में पड़ जाएं इस भावना से किया ।

 ➡ यदि आप प्रसन्न है तो मुझ पर कृपा कीजिए कृष्ण ने मंद मुस्कान भरी दृष्टि वरुण की तरफ की और वरुण समझ गए कि भगवान नाराज नहीं है प्रसन्न ही है ।

➡ इस प्रकार कृष्ण की जो वृंदावन धाम की लीलाएं हैं वह इतनी आकर्षक है इतनी माधुर्य भरी हैं उनका स्वरूप इतना आनंदप्रद है कि देवगण़् भी उनका दर्शन । उनका सानिध्य प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं ।

➡ भले ही उसके लिए उनको उत्पात् ही क्यों ना करना पड़े । ऐसे वृंदावन बिहारी लीलाधारी पुरुषोत्तम बाल कृष्ण भगवान की जय ।

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn