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Monday, 15 August 2016

श्री राधा रानी ब्रज की रखवारी

जय हो
  श्री राधा रानी के व्रज रखवारी
के बारे में एक फैक्ट और भी है
जो बहुत जन जानते है
और बहुत नही जानते ।
वृन्दाबनं में जो शासन है
प्रशासन है उसकी अधीश्वरी
श्रीराधा रानी हैं ।
 एक बार इस विषय में
सब सखा सखियों में
बहस छिड़ गयी कि राजा कौन ।
सखा बोले नंदलाल
श्रीकृष्ण ही राजा हैं । और कौन ।
सखिया बोली । राजा हैं
हमारी राधा रानी ।

सखा एवम् सखियों की सभा हुई

सबने अपने अपने तर्क रखे ।
कृष्ण एवम् सखा हार गए ।
हार स्वीकार की । एवम् सर्व सम्मति
से स्वयं कृष्ण एवम् सखाओं ने
श्री प्रिया जी का तिलक व
राज्याभिषेक किया ।
तब से श्री राधारानी ही
ब्रज की रानी हैं ।
प्रशासक हैं । व्रज रखवारी हैं ।
 इस पूरी लीला का वर्णन
माधव महोत्सव नामक ग्रन्थ में
श्री जीव गोस्वामी जी ने किया है ।
प्रामाणिक ग्रन्थ है । काल्पनिक नहीं ।
▼ Hide quoted text
 ॥ जय श्री राधे ॥ 
 ॥ जय निताई  ॥ 
 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Thursday, 7 July 2016

अफसोस अवश्य रहे

अफसोस अवश्य रहे


😌 अफसोस अवश्य रहे

🐿शास्त्र में एक साधक के पालन करने के लिए अनेक बातें अनेक आदेश दिए गए हैं । चाहे वह आदेश ना करने के लिए हो या करने के लिए हो

🌳हम गृहस्थी एवं प्राथमिक स्तर के साधक उन आदेश और उपदेशों का पूरा पूरा पालन नहीं कर पाते हैं

🌰और कहीं-कहीं तो बहुत छोटे से आदेश का भी पालन नहीं कर पाते हैं । समझ आते हुए भी ऐसे अनेक लोग हैं जो प्याज खाना भी नहीं छोड़ पा रहे ह ।

🌷ऐसे में शास्त्र के आदेशों का जो पालन हम लोग नहीं कर पा रहे हैं उनमें एक भाव तो यह है कि

🎯अरे भाई अब बड़ा मुश्किल है । कलयुग है । उन्होंने लिख दिया  । कोई ऐसे थोड़ी होता है ।ऐसे थोड़ी हो सकता है । अरे यह तो बड़ा मुश्किल काम है । यह तो हमारे बस का नहीं है यह हो ही नहीं सकता है ।

🎯कोई ऐसा दिखाओ हमको जो ऐसा करता हो यह भाव यदि है तो जीवन में हम उसको प्राप्त नहीं कर पाएंगे

🎯और यदि शास्त्र आदेश का पालन । विधि निषेध का पालन हम नहीं कर पा रहे हैं । साथ ही हमारे मन में एक अफसोस है ।

🕹अरे क्या करें हम तो फस रहे हैं ।

🕹हम चाहते हुए भी एक लाख नाम नहीं कर पा रहे हैं ।

🕹हम चाहते हुए भी प्याज नहीं छोड़ पा रहे हैं

🕹हमारी आसक्ति नहीं छूट रही है

🕹हमारी निष्ठा नहीं बन पा रही है

🕹हम क्या करें हमें बड़ा अफसोस है

🕹प्रभु कब कृपा करेंगे जब हमारा यह सब ठीक होगा

🕹संत कब कृपा करेंगे

🕹गुरुदेव कब कृपा करेंगे जब हम इन आदेशों का पालन कर पाएंगे

🕹यह ग्लानी और यह अफ़सोस यदि बना रहेगा तो एक ना एक दिन छूटने वाली चीजें छूट जाएंगी और प्राप्त करने वाली चीज अवश्य प्राप्त हो जाएगी

🏇क्योंकि हमारे मन में कहीं ना कहीं उस प्राप्ति का या उसको न कर पाने का जो खेद है वही हमें उस और बढ़ाएगा

🏆इसलिए शास्त्र का पालन जितना हो सके उतना हम करें यदि न हो सके तो दादागिरी न करते हुए मन में ग्लानि या अफसोस अवश्य रखें तो सफलता प्राप्त हो जाएगी



🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
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अफसोस अवश्य रहे


Saturday, 25 June 2016

निपटाना क्या



   निपटाना क्या   

जय श्री राधे ।
हम लोग अधिकतर यह कहते हैं कि जल्दी-जल्दी सुबह-सुबह भजन को निपटा लो । जिससे फिर अपने कामों में  लगेंगे

लेकिन जिन लोगों को यह समझ आ गई है कि हमारा यह मनुष्य जीवन भजन करते हुएश्री कृष्ण चरण सेवा को प्राप्त करने के लिए मिला है

वह इसका उल्टा बोलते हैं

जल्दी-जल्दी कामों को निपटा लो फिर जम के भजन करेंगे ।

और वास्तव में भी यही होना चाहिए । हमारा जीवन कामों के लिए नहीं मिला है । काम तो जीवन की रक्षा करने के लिए हैं और जीवन भजन के लिए है

अतः आज से ही हमें अभ्यास करना है कि हम जल्दी जल्दी कामों को निपटा लें जिससे जमकर भजन में लग जाए

निपटाना कामों को है
ना कि भजन को

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  🐚



 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया  
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 निपटाना क्या

Friday, 24 June 2016

भक्ति निरपेक्ष है

✅   भक्ति निरपेक्ष है    ✅  

निरपेक्ष का अर्थ है की भक्ति करने के लिए

▶ किसी विशेष स्थान
▶ किसी विशेष समय
▶ देशकाल और
▶ किसी विशेष परिस्थिति
▶ जैसे आयु आदि की अपेक्षा नहीं है

Thursday, 23 June 2016

भक्तों का पाप हरण

✅   भक्तों का पाप हरण  ✅   

▶ इस विषय में शास्त्रों में प्रमाण मिलते हैं कि भगवान भक्तों के पाप हरण कर लेते हैं।

▶ गीता में भी कहा है
▶ मैं तेरे समस्त पापों को हर लूंगा । लेकिन जहां जहां यह बात कही गई है । वहां शर्तें लागू हैं ।

▶ तुम पूर्ण रुप से मेरे शरणागत हो जाओ यह शर्त है । ऐसे ही  जिनके पापों का हरण भगवान करते हैं । वह
ऐसे परम वैष्णव भक्त हैं जो

▶ अन्य अभिलाषितात शून्य है
▶ जिनमें अपने सुख की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है
▶ जिन में अपने दुख निवृत्ति की इच्छा तो दूर
▶ जिंहें अपने दुख का ज्ञान भी नहीं है
▶ जो हर अवस्था में हर क्षण में केवल श्री गोविंद के सुख विधान करने की तीव्र इच्छा या उत्कंठा में अपना
▶ जीवन दांव पर लगाए हुए हैं जिन्होंने

Tuesday, 21 June 2016

अपराध लेना

✅   अपराध लेना    ✅  

▶ अपराध में दो पक्ष होते हैं ।
▶ एक अपराध करने वाला और
▶ एक अपराध लेने वाला

▶ वैष्णव जगत में चार प्रकार के अपराध है
▶ सेवा अपराध
▶ नाम अपराध
▶ वैष्णव अपराध
▶ भगवत अपराध

▶ इसमें सेवा नाम और भगवान ने अपराध लिया या नहीं लिया इसका अनुमान ही होता है लेकिन वैष्णव ने अपराध लिया या नहीं लिया इसका प्रत्यक्ष दर्शन होता है

▶ मध्यम कोटि के जो वैष्णव होते हैं अभी उनमें मान अपमान यश अपयश के प्रति समभाव नहीं होता है वह भजन तो करते हैं लेकिन वह अपराध ले लेते हैं

▶ अर्थात उनको अपराध करने वाले के प्रति रोश का भाव होता है उनसे अवश्य ही गिड़गिड़ा कर या किसी भी प्रकार अपने अपराध को क्षमा करना ही चाहिए

▶ ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि यह कैसा वैष्णव अभी इसमें मान अपमान के प्रति समान भाव ही नहीं आया

▶ दूसरे कुछ परम वैष्णव टाइप के वैष्णव होते हैं जो मान अपमान में समान रहते हैं अपराध के प्रति उनका किंचित चेष्टा या ध्यान ही नहीं होती अपितु वे इन सब के प्रति उदासीन होते हैं

▶ उन्हें पता ही नहीं होता कि कौन मान दे रहा है और कौन अपमान कर रहा है कौन अपराध कर रहा है लेकिन शास्त्र में कहा गया है कि ऐसे महाभागवत वैष्णवों की चरण रज उनके अपराध को लेती है और अपराधी के भजन में बाधा होती है

▶ अतः ऐसे महाभागवत वैष्णव जन की चरण रज की वंदना करके उनसे उनके प्रति किए गए अपराधों को भी अवश्य ही क्षमा कर आना चाहिए

▶ श्रीमद्भागवत में राजा रहुगणने जड़भरत के प्रति अपराध किया जड़ भरत को अपराध का भान भी नहीं हुआ किंतु फिर भी राजा ने पालकी से उतर कर जड़भरत के चरणों में अपना मस्तक रखकर उनसे अपना अपराध क्षमा करवाया

▶  अतः वैष्णव अपराध में यदि हमसे अपराध हुआ है और हमें उसका भान है तो वैष्णव निम्न कोटि का हो मध्यम कोटि का हो या उच्च कोटि का हो उस वैष्णव से अपना अपराध अवश्य ही क्षमा कर आना चाहिए

▶ अन्यथा भजन में बाधा बनती ही रहेगी

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


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अपराध लेना

Monday, 20 June 2016

अपराध

✅   अपराध   ✅  

▶ यह एक ऐसा शब्द है कि हर वैष्णव के मुख पर विराजमान है । लेकिन इसका भाव और अर्थ बहुत कम लोग शायद जानते होंगे ।

▶ अपराध दो शब्दों से बना है

▶ अप एवं राध ।
▶ राध माने संतोष । अप माने बाधा । जिससे भजन के संतोष में बाधा हो उस कार्य क्रिया को अपराध कहते हैं ।

▶ अपराध का शरीर से कोई मतलब नहीं है
▶ अपराध आत्मा का विषय है ।

▶ अपराध से शरीर में कोई कष्ट नहीं होता है
▶ ना अपराध से एक्सीडेंट होता है
▶ ना अपराध से बीमारी होती है
▶ ना अपराध से दुकान की बिक्री कम होती है
▶ ना अपराध से संतान में बाधा होती है

▶ कुल मिलाकर अपराध से लौकिक विषय
▶ में कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता है और

▶ ना ही अपराधका फल
▶ भोगने के लिए कोई नर्क बने हुए हैं

▶ इन सब कामों पर पाप पुण्य का प्रभाव पड़ता है पाप पुण्य शरीर से संबंधित हैं और अपराध भजन और आत्मा से संबंधित है ।

▶ अपराध होने एक बहुत बड़ी बात होती है वह होती है भजन में बाधा । भजन में बाधा होने से भजन करने से ▶ जो आनंद और संतोष प्राप्त होता है वह प्राप्त होना बंद हो जाता है ।

▶ साथ ही भजन उसी का बंद होगा ना जो भजन करता होगा । मेरी तरह भजन का नाटक करने वालों का क्या ▶ भजन बंद होगा । भजन तो हो ही नहीं रहा वैसे भी ।

▶ अतः अपराध और पाप के अंतर को हम समझे रहे । पाप यदि किया या हुआ  और उसका फल भोग लिया तो वह समाप्त हो जाता है लेकिन अपराध का एक ही फल है  कि हमारा भजन नहीं बनता है  ।

▶ शायद यह ही जीवन की सबसे बड़ी हानि है  क्योंकि यह जीवन भजन के लिए मिला है  भजन यदि नहीं बना  तो फिर जीवन किस काम का ।

▶ अतः अपराध को  हल्के में नहीं लेना चाहिए  यह एक ऐसा अवरोध है जो हमारे  जीवन के फल भजन को तुरंत बाधित कर देता है । अगले जन्म का भी कोई चक्कर नहीं इसमें । यहीं । अभी । इंस्टेंट असर है इसका । ▶ जबकि पाप तो कुछ अभी । कुछ अगले जन्म में भोगते हैं । कुछ नर्क में भोगते हैं ।

▶ पाप करते हुए भी चैन और मस्ती से पूर्व पुण्यों के कारण जीते हुए रह सकते हैं लेकिन अपराध् यदि हो गया तो चैन छीन गया समझो ।

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


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अपराध

Saturday, 3 December 2011

154. प्रारब्ध और भजन


प्रारब्ध और भजन


प्रारब्ध या भाग्य
वो कर्म हैं जिन्हें हमें भोगने के लिए इस जीवन में दिया गया है 

भजन या भक्ति प्रारब्ध के वश में नहीं है
अलग डिपार्टमेंट है

 R T O office में housetax जमा नहीं हो सकता
और नगर पालिका में रोड टैक्स जमा नहीं हो सकता

प्रारब्ध में भजन - भक्ति है ही
इसका  प्रमाण हमारा  यह मानव  शरीर  हमें मिलना है
यह भजन करने के लिए ही मिला है

भजन केवल और केवल करने से होगा
भजन करने से कृपा प्राप्त होगी नाकि कृपा से भजन होगा

अतः प्रारब्ध को अलग रखना है और भजन - भक्ति को अलग
भक्ति ;निरपेक्ष' तत्व है, यह भाग्य के वशीभूत या भाग्य की अपेक्षा नहीं रखता

JAI SHRI RADHE

Monday, 31 October 2011

129. gyani bhakt


ज्ञानी 
मिश्री की उपासना करके 
मिश्री बनना चाहता है

भक्त 
मिश्री की उपासना करके 
मिश्री का रस आस्वादन करता है

Sunday, 9 October 2011

103. असत्संग - नरक का द्वार

✅   असत्संग – नरक का द्वार  ✅  

▶ सत्संग का अपोजिट है असत्संग
▶ सत्संग करते हुए चेष्टा पूर्वक असत्संग का भी त्याग करना चाहिए
▶ आप सत्शास्त्रों का संग कर रहे हैं
▶ भजन कर रहे हैं, चिंतन कर रहे पूर्ण आनंद है
▶साथ ही एक
▶आपका कोई दुष्ट मित्र रोज आपके पास आता है
▶उलटे-सीधे नानवेज चुटकुले सुनाता है
▶ बुरी बुरी बातों में ही श्रेष्ठता स्थापित करता है,
▶ इसी प्रकार के ही समस्त  क्रिया - कर्म असत्संग हैं, इनसे बचना चाहिये
▶ अन्यथा विवेक भ्रमित  होता है और
▶ भटकने  की संभावना जाग्रत हो जाती है और
▶ नरकों का द्वार खुल जाता है
▶ अत: सत्संग के साथ साथ असत्संग - त्याग पर भी केन्द्रित रहना चाहिये
▶ वैसे द्रढ़ भाव से सत्संग करने और
▶असत्संग की अवहेलना करने पर, उससे किनारा करने पर असत्संग
▶ स्वत: ही भाग जाता है, फिर भी ध्यान  रखना आवश्यक है

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
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Friday, 7 October 2011

101. RA == DHA== ???

✅  रा धा  ? ✅ 

▶ ब्रह्म-वैवर्त पुराण में एक बहुत अच्छी व्याख्या प्राप्त हुयी है

▶ रा = रासविहारी की रास में जो

▶ धा = धावित हुयी यानी भागकर आयी , वह


▶राधा


अहह ! जय हो ! जय श्री राधे !!

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚



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100. bhakt 4 prakaar ke

✅  भक्त चार प्रकार के ✅  

१. आर्त
▶ जो अपने दुखों से छुटकारा पाने के लिए भक्ति  करते हैं

२. जिज्ञासु
▶ जो कृष्ण को  जानने के लिए या केवल जानकारी के लिए भक्ति  करते हैं

३. अर्थार्थी
▶ जो अर्थ, यश, पुत्र,व्यापार=किसी लौकिक कामना के लिए भक्ति करते हैं

४. ज्ञानी
▶ जो कृष्ण की प्रीती, उनको सुख, उनकी अनुकूलता मयी सेवा या ये कहिये की भक्ति के लिए
भक्ति करते हैं, न कोई कामना, न दुःख की निवृत्ती - ये विशुद्ध भक्त हैं

▶ अनपढ़ा से ४ क्लास पढ़ा हो,ना अच्छा है,- अभक्त से कोई भी भक्त होना अच्छा है
▶ लेकिन क्लास आगे और भी हैं, चलते रहिये



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Thursday, 6 October 2011

98. आठवां नामापराध

✅   आठवां नामापराध   ✅  


▶ शास्त्र में दस नामापराध कहे गए हैं, उनमे आठवा है-
▶ ८. जो लोग विमुख है, या उपदेश को मानते नहीं है, उन्हें उपदेश देना भी एक अपराध है
▶ प्रश्न है की जो जानता है या मानता है, उसे तो उपदेश की ज़रुरत ही नहीं है
▶ श्री सनातन गोस्वामी ने समाधान किया है की-
▶ उपदेश देना तो है, लेकिन ज़बरदस्ती नहीं करनी है,
▶ यदि मानता है तो, उसे और बताते जाओ, नहीं मानता तो बहस मत करो
▶ चुपचाप निकल लो , ज़बरदस्ती करने से , वह निंदा रूपी अपराध में फास्ता जाएगा
▶ और उसका कल्याण होने की बजाय अहित हो जाएगा.
▶ और वह जो निंदा करेगा - हम सुनेंगे तो हमें भी निंदाश्रवण का अपराध लगेगा


🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚



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Wednesday, 5 October 2011

95. मनमानी से भी ज़रूर मिलेगा

✅   मनमानी से भी ज़रूर मिलेगा   ✅ 

▶ भक्ति को शास्त्र में निरपेक्ष कहा गया है,
▶ यानी यह किसी की अपेक्षा नहीं रखती, यह भगवान् की ही तरह परम स्वतंत्र है,
▶ न शास्त्र, न विधि, न निषेध, न मंत्र, न नियम, न साधन, न ज्ञान,
▶ इस बात के प्रमाण में ऐसे अनेक संत हुए हैं,
▶ एक संत ने भोग न लगाने पर प्रभु को पहले तो खूब हडकाया,
▶ न मानने पर डंडा उठा लिया, - प्रभु प्रकट हो गए और भोग लगाया.
▶ ठाकुर को डंडा मारना शास्त्रीय नहीं है, न भक्ति के ६४ अंगों में आता है
▶ इसी प्रकार हम जो कर रहे हैं, उलटा-सीधा, उचित-अनुचित,
▶ अशास्त्रीय,
▶ हमें यदि आत्मिक आनंद मिल रहा है,प्रभु का अहसास हो रहा है, हम गदगद हैं,
▶ तो इससे बढ़कर कुछ भी नहीं, न शास्त्र, न साधू, न संत, न विद्वान.
▶ और यदि संतुष्टि है नहीं, भटकन बनी हुयी है, अहसास हो नहीं रहा, आनंद का लेश भी
▶ नहीं है, तर्क-कुतर्क, हार-जीत का सिलसिला, राग द्वेष, अहंकार, बना है तो हम भटक रहे हैं
▶ और यह भटकन शास्त्र विधि का अनुसरण करने पर ही दूर होगी. मनमानी बंद करनी ही होगी.
▶ आत्म- निरीक्षण से स्वयं को नापना होगा, दुसरा कोई कुछ भी कहे, कहता रहे

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