Sunday, 9 October 2011

106. शुद्धि


शुद्धि 


सत्य और न्याय पूर्वक अर्जन से 
धन की 
ऐसे धन से खरीदे हुए अन्न
से आहार की 
यथायोग्य नीति पूर्वक आचरण से 
आचरण की 
जल - मिट्टी - साबुन आदि से 
शरीर की 
शुद्धि को बाह्य शुद्धि कहते है |

राग - द्वेष - कपट आदि 
विकारों का नाश होकर 
अंत:करण 
की शुद्धी को अन्तःशुद्धी कहते है 

JAI SHRI RADHE

DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban

105. अविधिपूर्वक भजन




अविधिपूर्वक भजन 

हे अर्जुन !
यद्यपि  श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त 
दूसरे - दूसरे देवताओं को पूजते हैं 
वे भी अप्रत्यक्ष रूप से 
मुझको ही पूजते हैं 
लेकिन उनका वह पूजन 
अविधि अर्थात अज्ञान - पूर्वक ही है
गीता ९ - २३
   
JAI SHRI RADHE

DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban



104. कमाई व खर्च


 

कमाने के साथ साथ  
बुद्धिमानी या सावधानी 
पैसा खर्च  करने मै है
 
आय से अधिक खर्च करने 
वाला जहाँ मुर्ख है
आय के अनुपात मै 
कम खर्च करने वाला
भी मुर्ख ही है

जब खर्चना ही नहीं है तो
और - और - और
अधिक कमा क्यों रहे हो ?
आवश्यकता है संतुलन की  
  
JAI SHRI RADHE


103. असत्संग - नरक का द्वार

✅   असत्संग – नरक का द्वार  ✅  

▶ सत्संग का अपोजिट है असत्संग
▶ सत्संग करते हुए चेष्टा पूर्वक असत्संग का भी त्याग करना चाहिए
▶ आप सत्शास्त्रों का संग कर रहे हैं
▶ भजन कर रहे हैं, चिंतन कर रहे पूर्ण आनंद है
▶साथ ही एक
▶आपका कोई दुष्ट मित्र रोज आपके पास आता है
▶उलटे-सीधे नानवेज चुटकुले सुनाता है
▶ बुरी बुरी बातों में ही श्रेष्ठता स्थापित करता है,
▶ इसी प्रकार के ही समस्त  क्रिया - कर्म असत्संग हैं, इनसे बचना चाहिये
▶ अन्यथा विवेक भ्रमित  होता है और
▶ भटकने  की संभावना जाग्रत हो जाती है और
▶ नरकों का द्वार खुल जाता है
▶ अत: सत्संग के साथ साथ असत्संग - त्याग पर भी केन्द्रित रहना चाहिये
▶ वैसे द्रढ़ भाव से सत्संग करने और
▶असत्संग की अवहेलना करने पर, उससे किनारा करने पर असत्संग
▶ स्वत: ही भाग जाता है, फिर भी ध्यान  रखना आवश्यक है

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया  
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Saturday, 8 October 2011

102. सत्व - रज- तम : साधुओं मैं भी

✅   सत्व - रज- तम : साधुओं मैं भी  ✅  

▶ वैसे तो संतों में, साधुओं मैं
▶  सज्जनों में, महापुरुषों मैं, वैष्णवों में
▶ सदैव सत्व गुण की ही प्रधानता  रहती है
▶ दुसरे गुण चुपचाप थोड़े अंश में एक ओर
▶ पड़े रहते हैं, ओर हावी होने का मौक़ा देखते रहते हैं |
▶ मौक़ा मिलते ही जब रजोगुण हावी होता है
▶ तो साधू - वैष्णव में काम - वासना नहीं होती
▶ वे ठाकुर का नया सिंहासन वनवाने मै, नए वस्त्र बनाने मै,
▶ मंदिर की  पुताई - लिपाई में अच्छे प्रसाद अमनियां
▶ की व्यवस्था में एवं अन्य पोसितिवे सेवाओं मै
▶  इस रजो गुण का प्रयोग क्रियाशीलता
▶ में करते हुए इसका सदुपयोग कर लेते हैं |
▶ इसी तरह  जब तमोगुण अवसर ढूढता है तो
▶ वे क्रोध करते हैं - अपने अवगुणों पर 
▶ हिंसा करते हैं - अपनी बुरी आदतों की 
▶ दमन करते हैं - अपनी इन्द्रिओं का
▶ और अहंकार करते हैं - अपने श्री कृष्णदास होने का
▶ गुण तीनों आवश्यक हैं, स्रष्टि का आधार हैं
▶ अंतर होता है इनकी मात्रा का और बुद्धिमानी है - इनके सही प्रयोग करने मैं

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚



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Friday, 7 October 2011

101. RA == DHA== ???

✅  रा धा  ? ✅ 

▶ ब्रह्म-वैवर्त पुराण में एक बहुत अच्छी व्याख्या प्राप्त हुयी है

▶ रा = रासविहारी की रास में जो

▶ धा = धावित हुयी यानी भागकर आयी , वह


▶राधा


अहह ! जय हो ! जय श्री राधे !!

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚



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100. bhakt 4 prakaar ke

✅  भक्त चार प्रकार के ✅  

१. आर्त
▶ जो अपने दुखों से छुटकारा पाने के लिए भक्ति  करते हैं

२. जिज्ञासु
▶ जो कृष्ण को  जानने के लिए या केवल जानकारी के लिए भक्ति  करते हैं

३. अर्थार्थी
▶ जो अर्थ, यश, पुत्र,व्यापार=किसी लौकिक कामना के लिए भक्ति करते हैं

४. ज्ञानी
▶ जो कृष्ण की प्रीती, उनको सुख, उनकी अनुकूलता मयी सेवा या ये कहिये की भक्ति के लिए
भक्ति करते हैं, न कोई कामना, न दुःख की निवृत्ती - ये विशुद्ध भक्त हैं

▶ अनपढ़ा से ४ क्लास पढ़ा हो,ना अच्छा है,- अभक्त से कोई भी भक्त होना अच्छा है
▶ लेकिन क्लास आगे और भी हैं, चलते रहिये



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