Saturday, 10 December 2011

160. jaisa dhan vaisa vichar



विचारों का कारण धन
जैसा हो धन, वैसा हो अन्न, वैसा हो मन,
अन्न एवं धन के आधार पर मन में तीन प्रकार क विचार उठते हैं-

१. सात्विक, २. राजसिक, ३. तामसिक,

जैसे विचार होते हैं, वैसा ही हमारा आचार या आचरण होता है,
विचारों के कारण ही हम सदा ही  प्रसन्न, क्रियाशील,एवं क्रोधित होते हैं 
अतः सदैव आधार वास्तु धन पर ध्यान रहे की 
किसी भी प्रकार से दूषित या दुसरे को दुःख देकर 
धन का संग्रह न होने पाए


इस प्रकार जब जड़ ठीक होगी तो सब ठीक होगा, 
न बुरे विचार उठेंगे, न बुरा आचरण होगा,
न दुःख होगा, न क्लेश, सर्वत्र होगा - आनंद ही आनंद
  

JAI SHRI RADHE










DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban

Friday, 9 December 2011

159.PREM K VISHAY : SHRIKRISHN

PREM K VISHAY : SHRIKRISHN



प्रेम के विषय - श्री कृष्ण 

दो बात हैं : एक है विषय, दूसरा है आश्रय 
प्रेम के एकमात्र विषय हैं - श्री कृष्ण, दूसरा कोई है ही नहीं

अर्थात प्रेम यदि हो सकता है, तो कृष्ण से ही हो सकता है. = विषय 
और जो प्रेम करता है, वह है आश्रय = राधाजी , आप, हम, अनेक संत, भक्त.  

कृष्ण के अतिरिक्त यदि हम किसी से प्रेम करते हैं तो शास्त्र कहता है कि
वह प्रेम है ही नहीं, हो भी नहीं सकता, क्योंकि प्रेम के एकमात्र आश्रय कृष्ण ही हैं
ठीक वैसे जैसे मिटटी के बिना 'मिटटी का बर्तन' बन ही नहीं सकता, 
मिटटी के बिना बनेगा तो वह 'मिटटी का बर्तन' नहीं होगा.

तो फिर हम माता-पिता , भाई - बहिन  या पति - पत्नी या
लड़का - लड़की से जो प्रेम करते हैं, वह क्या है ?

वह प्रेम नहीं ; 'काम' या कामना है, इसीलिये ऊपर लिखे ये समस्त प्रेम टूट जाते हैं, और 
कृष्ण से यदि प्रेम हो जाय तो आज तक किसी का न टूटा है, न टूटेगा

JAI SHRI RADHE

DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban

Wednesday, 7 December 2011

158. UPAASANAA

उपासना 

उपासना सकाम हो या श्री कृष्ण प्रीति के लिए की गयी हो
सदैव वर्तमान से श्रेष्ठता की और अग्रसर होने 
के लिए की जाती है

श्रेष्ठता की और अग्रसर होने से वर्तमान की 
कम श्रेष्ठता या निकृष्टता  से भी सहज मुक्ति मिल जाती है 

JAI SHRI RADHE

DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
made to serve ; GOD  thru  Family  n  Humanity

Monday, 5 December 2011

157. thes ya apmaan



दही से दूध 

'आधा किलो दही में २५० ग्राम शहद एवं आधा किलो पानी 
मिलाने से एक किलो दूध बन जाता है'

-ऐसी बातें देखने एवं सुनाने से एक ऐसा व्यक्ति जिसे 
पूरी तरह मालुम है की यह बात गलत है, तो वह सत्य, एवं वास्तविकता का
परिचय देने के लिए, इसे गलत बताते हुए सही बात बताता या लिखता है, उसका उद्देश्य बात काटना नहीं होता

न ही किसी को ठेस पहुंचाना होता है, हमें सदैव सकारात्मक लेना चाहिए.
और खुले मन से ज्ञान वर्धन हेतु तैयार रहना चाहिए,
  
JAI SHRI RADHE


DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia

156. kan - kan me bhagvan

Saturday, 3 December 2011

155. dukan n shaadi

dukan n shaadi



दूकान और शादी

कोई भी यदि दूकान चलाता है तो, उसका एक मात्र उद्देश्य धन प्राप्त करना है
धन से या तो यश प्राप्त करता है या दान देता है
और सर्वाधिक लोग सुख सुविधा बच्चो की पढ़ाई शादी के लिए इसे उपयोग करते है, ठीक भी है

लेकिन शायद कुछ लोग केवल दूकान चलाने के लिए दूकान चलाते हैं
उन्हें ये ज्ञान व् ध्यान नहीं की जिसके लिए ये दूकान चलाई गयी थी
वह शादी आज मेरे घर में हो रही है, आज दूकान छोड़ दूँ
जीवन भर चलाने वाली दूकान का फल आज प्राप्त करने का अवसर आ गया है
और वे आज भी दूकान बंद नहीं करते और दुकान और शादी के बीच में आत्मा की तरह भटकते रहते है

आर्थिक परिस्थिति ठीक न हो तो बात समझ में आती है
लेकिन बात अर्थ की नहीं है, सोच की है, विजन की है, विचार की है 

जैसे भजन के लिए मिले शरीर से भजन छोड़कर दुसरे काम करते रहते हैं,
उसी प्रकार शादी जैसे कामो के लिए खोली गयी दूकान में लगे रहते है और शादी छोड़ देते हैं

154. प्रारब्ध और भजन


प्रारब्ध और भजन


प्रारब्ध या भाग्य
वो कर्म हैं जिन्हें हमें भोगने के लिए इस जीवन में दिया गया है 

भजन या भक्ति प्रारब्ध के वश में नहीं है
अलग डिपार्टमेंट है

 R T O office में housetax जमा नहीं हो सकता
और नगर पालिका में रोड टैक्स जमा नहीं हो सकता

प्रारब्ध में भजन - भक्ति है ही
इसका  प्रमाण हमारा  यह मानव  शरीर  हमें मिलना है
यह भजन करने के लिए ही मिला है

भजन केवल और केवल करने से होगा
भजन करने से कृपा प्राप्त होगी नाकि कृपा से भजन होगा

अतः प्रारब्ध को अलग रखना है और भजन - भक्ति को अलग
भक्ति ;निरपेक्ष' तत्व है, यह भाग्य के वशीभूत या भाग्य की अपेक्षा नहीं रखता

JAI SHRI RADHE