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Thursday, 6 October 2016

सारे कलेश की जड़ भोजन

✔  *सारे कलेश की जड़ भोजन*    ✔

▶ हम भोजन को बहुत हल्के में लेते हैं लेकिन भोजन का हमारे जीवन पर कितना, अरे कितना क्या, पूरा का पूरा प्रभाव पड़ता है ।

▶ हमारा स्वभाव
▶ हमारा चिंतन
▶ हमारा आचरण
▶ हमारा क्रोध
▶ हमारा लोभ
▶ हमारा काम
▶ हमारी ईर्ष्या
▶ हमारा स्वास्थ्य
▶ हमारे मन की चंचलता

Saturday, 27 October 2012

265. PREM K PRAKAAR


प्रेम के प्रकार

१. सात्विक 
इस प्रेम में केवल देना ही देना स्वभाव बन जाता है 
उसका सुख, उसकी अनुकूलता ,उसके लिए सब कुछ 

भक्ति यद्यपि त्रिगुणातीत है लेकीन इसे भी भक्ति या शुद्ध प्रेम कह सकते है 

२. राजसिक 
इस प्रेम में लेना व देना दोनों चलते है 
मैने तुमको इतना प्रेम किया - बदले में तुमने मुझे क्या दिया ? 
बस यह दिया ? यही सिला दिया मेरे प्यार का ?

३. तामसिक 
प्रेम के कारण जान  देने या लेने को उतारू हो जाना 
जेसे कि  आतंक वादी  
उसे भी कुछ न कुछ प्रेम हो जाता है की वह उसके लिए 
दुसरे की जान लेने और अपनी जान देने को तैयार रहता है 

सर्वोत्तम :  प्रेम -  भक्ति 
और इन तीनों  से परे श्री कृष्ण की अनुकुलतामयी 
स्वसुख गंध लेश शून्य जो क्रिया  है -वह है भक्ति 

JAI SHRI RADHE

DASABHAS Dr GIRIRAJ NANGIA

Friday, 30 March 2012

197. SAJJAN YA CRIMNAL




सज्जन या क्रिमनल
कभी हमारा कोई काम अटक जाए तो 
हम या तो नगर के प्रतिष्ठित सज्जन व्यक्ति से निवेदन करते हैं 
अथवा फिर किसी क्रिमिनल टाइप के आदमी से संपर्क करते हैं. 
और शायद हमारा काम हो जाता है 

काम होने के बाद सज्जन व्यक्ति भविष्य में कभी ब्लैक मेल नहीं करता, 
लेकिन क्रिमनल के साथ इस बात की पूरी सम्भावना रहती है. 
उसे महत्व न देने पर वह हमें परेशान भी कर सकता है.

सज्जन एवं क्रिमनल की भांति  देवता भी 
सात्विक, राजसिक, तामसिक तीन प्रकार के होते हैं.

इन्द्र की पूजा जब तक होती रही, तब तक तो ठीक. 
पूजा न होने पर ब्रज को तहस-नहस करने चला था.

लोक में भी दुर्गा-काली आदि की पूजा में यदि
भूल हो जाए तो ये तुरंत अनिष्ट करती हैं-यह प्राय देखा गया है.

लेकिन सात्विक देवता, विशेषकर देवताओं के भी देव भगवान श्री कृष्ण या राम
की पूजा-भक्ति करो तो वे प्रसन्न. न करो तो भी प्रसन्न. 

इनकी पूजा न करने से ये अनिष्ट नहीं करते. 
सर्व श्रेष्ठ हैं तो फिर क्यों भागना इधर-उधर ?

DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban

SAJJAN YA CRIMNAL

Saturday, 10 December 2011

160. jaisa dhan vaisa vichar



विचारों का कारण धन
जैसा हो धन, वैसा हो अन्न, वैसा हो मन,
अन्न एवं धन के आधार पर मन में तीन प्रकार क विचार उठते हैं-

१. सात्विक, २. राजसिक, ३. तामसिक,

जैसे विचार होते हैं, वैसा ही हमारा आचार या आचरण होता है,
विचारों के कारण ही हम सदा ही  प्रसन्न, क्रियाशील,एवं क्रोधित होते हैं 
अतः सदैव आधार वास्तु धन पर ध्यान रहे की 
किसी भी प्रकार से दूषित या दुसरे को दुःख देकर 
धन का संग्रह न होने पाए


इस प्रकार जब जड़ ठीक होगी तो सब ठीक होगा, 
न बुरे विचार उठेंगे, न बुरा आचरण होगा,
न दुःख होगा, न क्लेश, सर्वत्र होगा - आनंद ही आनंद
  

JAI SHRI RADHE










DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban

Monday, 21 November 2011

145. KAISE - KAISE TAP


KAISE - KAISE TAP

शारीरिक तप
देवता, ब्रह्मण, ज्ञानीजन का पूजन 
पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, का अभ्यास या आदत 

वाणी का तप  
अनुद्वेग, प्रिय भाषण, हितकारी, भाषण 
यथार्थ भाषण, शास्त्र - पाठन परमेश्वर का नाम जप का अभ्यास या आदत 

मानसिक तप 

मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवद्चिंतन की आदत 
मनको मारनेकी आदत, अन्त:करन मैं पवित्र विचार की आदत का अभ्यास 

सात्विक तप 
फल की कामना न रखकर शास्त्राज्ञा से किया गया भजन, पाठ, पूजा 

राजसिक तप 
सत्कार सम्मान, स्वार्थ, पाखंड या छिपे हुए 
किसी उद्देश्य से किया गया अनुष्ठान 

तामसिक तप 
हठपूर्वक, मुढ़तापुर्वक, न चाहते हुए,मन, वाणी, शरीर को 
कष्ट पहुचाते हुए अथवा दूसरे के अनिष्ट के लिए किया गया अनुष्ठान

  
JAI SHRI RADHE