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Tuesday, 12 July 2016

दृष्टि और सृष्टि

दृष्टि और सृष्टि


*दृष्टि और सृष्टि*

☺जब हमारी दृष्टि कमजोर हो जाती है तब हमें सारी चीजें धुंधली दिखाई देने लगती हैं

😊क्या वास्तव म चीजें *धुंधली* होती हैं । नही न  । बस एक चश्मा लगाते ही सब धुंधलापन समाप्त हो जाता है ।

😢इसी प्रकार इस संसार के प्रति जब हमारी *दृष्टि* दोषपूर्ण हो जाती है तो इस संसार में । संसार की वस्तुओं में हमे दोष । दुःख दिखाई देने लगता है

👍वस्तु में न तो *सुख* है । न *दुःख* है । ये दोष या *गुण* हमारी दृष्टि में है । यदि वस्तु अच्छी या बुरी होती तो वो साड़ी जो आपको अच्छी लगी और आप खरीद कर ले आये । वह साड़ी अनेक लोगों द्वारा *रिजेक्ट* की जा चुकी होती है ।

Saturday, 4 June 2016

नरक

✅  नरक   ✅ 

▶ नरक
▶ जाने से
▶ पाप कटते हैं

▶ कुसंग में
▶ जाने से
▶ पाप बढ़ते हैं

▶ अतः कुसंग
▶ से बचो !!

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

Thursday, 2 June 2016

अपराध



✅   अपराध   ✅

▶ पाप वो है जो लौकिक विषय में गलत कार्य है । पाप कुछ किया उसका फल कुछ मिलेगा ।

▶ भोगना ही पड़ता है । यहाँ या नर्क में । अवश्यमेव भोक्तव्यं

▶ अपराध का
1⃣ लौकिक जगत स कोई सम्बन्ध नही है ।
2⃣ ये भगवत विषय में की जाने वाली भूलें हैं ।
3⃣ दो शब्दों से बना है । आप एवम् राध । राध माने संतोष । आप माने बाधा ।
4⃣ जब संतोष में बाधा लगे । तब समझो अपराध हुआ ।
5⃣ संतोष में बाधा या असंतोष ।
किसमे असंतोष । चार विषय में । क्योंकि अपराध 4 प्रकार के है
6⃣ नाम अपराध
     ▶  सेवा अपराध
     ▶ वैष्णव अपराध
     ▶  भगवद् अपराध
7⃣ जब जब इन चार विषयों में असंतोष हो तो समझो अपराध हुआ है ।
8⃣ वैष्णव अपराध को वैष्णव से क्षमा कराना होता है ।बाकी के तीनो नाम लेने से दूर हो जाते हैं
9⃣ पाप के लिए जेसे नरक हैं ऐसे अपराध के लिए कोई नर्क नही है
1⃣0⃣ न ही कोई शारिरिक कष्ट होता है । क्योंकि अपराध का शरीर से कोई लेना देना नही
1⃣1⃣ अपराध का सम्बन्ध भजन से है । भजन में असंतोष ही इसका फल है
1⃣2⃣ या यों समझिये की प्रोसेस डिले होगा । जो काम 1 साल में होना ह वो 10 साल में होगा ।

अतः पाप और अपराध का अंतर समझे रहिये । बचिए । और डिले होने से बचाइये

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


Tuesday, 17 May 2016

उपदेश किसे

✅ उपदेश किसे ✅

▶ ऐरे गेरे नत्थू खेरे को नही अवैष्णव को कभी नही

▶ साव्धान

▶ भगवान को दोष आरोपण करने वाला
▶ भजन न करने वाला
▶ जन्म मृत्यु
▶ झगड़े झंझट की ही बात करने वाला

▶ भजन भक्ति से जिसका सरोकार नही
▶ ऐसा व्यक्ति का संग असत्संग है
▶ जो क्लेश की जड़ है

▶ से व्यक्ति से बात करना अपराध ह
▶ ऐसे को भजन उपदेश करना नाम अपराध है

▶ जो जिज्ञासु हो ।
▶ भजन का रहस्य जानना चाहता हो

▶ तद्विद्धि प्रणिपातेन ।
▶ प्रणाम एवम् श्रद्धा पूर्वक जिज्ञासा करे ।
▶ क्यू
▶ उसे भजन उपदेश देना ही वैष्णव का कर्तव्य है । पंडाल लगा कर 130 करोड़ लोगों के कल्याण का प्रयास कभी भी हमारे आचार्यों ने नही किया ।

▶ ऐसा कहना एवम् आमन्त्रण देना भी भूल एवम् भ्रम है । हम अपना मन वचन कर्म तो एक कर लें । फिर दूसरे का कल्याण होगा । सच मानिए अभी हमारा अपना 1 पैसे भर कल्याण हुआ है

▶ और हम चले 130 करोड़ का कल्याण करने । बहुत सूक्ष्म चिंतन है । अतः सावधान

▶ समस्त वैष्णवजन को सादर प्रणाम
🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚




Thursday, 12 May 2016

कुछ तो रहस्य होगा

कुछ तो रहस्य होगा



▶ श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी के एक शिष्य थे।एकादशी व्रत के दिन मुख में पान चबाते हुए उन्हें प्रणाम करने आए और अति रोमांचित व् गदगद  स्वर में श्री गुरुदेव को बताया कि गुरुदेव आपकी कृपा से या पान स्वयं श्री राधारानी ने  मुझे आज अपने हाथ से दिया और मैंने पा लिया

▶ श्री गोपाल भट्ट ने रोष भरे नेत्रों से देखा और कहा आज तो  तुम्हारा व्रत है ? व्रत में ताम्बूल ? पान? ये क्या तुमने ?प्रभु यह प्रसादी साक्षात श्री प्रियाजी ने दिया है तो क्या तुम बिना प्रसादी भी खाते हो जो खाते हो प्रसादी ही तो होता है और देने वाला तो श्री राधारानी है प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष लेकिन तुमने शास्त्र विधि का भजन का उल्लंघन किया है अतः आज से तुम मेरे शिष्य नहीं मैं तुम्हारे गुरु नहीं कहीं अन्यंत्र आश्रय  खोजो

▶और शिष्य महोदय बहुत ही विहल दशा में गुरुदेव को प्रणाम कर चले गये। पुनः कभी नहीं आये।अब  प्रश्न यह है कि  साधनों का फल तो श्री कृष्ण दर्शन कृष्ण कृपा है जो साक्षात् प्राप्त हुई श्री राधा रानी के द्वारा प्रदत्त पान द्वारा फिर भी एकादशी व्रत खण्डन के लिए शिष्य और ऐसा शिष्य जिसे प्रिया जी ने स्वच्विर्त दिया हो उसका त्याग कुछ तो रहस्य होगा।

▶ दूसरा उधारण हैं पुण्डलिक जी का। अपने गुरुदेव से पुण्डलिक जी  ने पूछा तो मुझे भगवान के दर्शन कैसे होंगे गुरुदेव ने उसके विषय में जाना और काहा तुम भगवत दर्शन को अपना लक्ष्य रखते हुये  अपने माता पिता की सेवा करो ध्यान रहे लक्ष्य माता पिता की सेवा नहीं लक्ष्य भगवत दर्शन साधन माता पिता की सेवा कितना सूक्ष्म चिंतन है तो वह तो माता पिता की सेवा हो रही है लेकिन यह सेवा करने का लक्ष्य क्या है भाव क्या है इसमें बहुत अंतर पड़ता है।

▶मैं यह निबंध लिख रहा हूं यदि भगवत गुणगान है तो भक्ति का अंग है और यदि इसे लिखने पर मुझे ₹5000 मिलते हैं तो यह व्यापार हो गया एक ही कार्य के अनेक रुप अस्तु
सेवा हुई एक दिन प्रभु दरवाज़े पर आ गये।पुण्डलिक द्वार खोलो कौन? मैं विट्ठल !प्रभु! आप बड़ी कृपा जो आप आये लेकिन इंतजार करो अभी मेरी गोद में माँ सोई है। पिता के चरण दबा रहा हूं इन्हें छोड़कर दरवाजा खोलने नहीं उठ सकता आप द्वार पर इंतजार कीजिये ।

▶ पुण्डलिक मुझे कितना इंतजार करना होगा?प्रभु! कोई पता नहीं जब मां की नींद खुलेगी तब तक ।आप थक गए हो तो पास में एक पड़ी उसमें से एक ईंटे लेकर उस पर बैठ जायँ। प्रश्न फिर वही कि जिस प्रभु के लिये साधन किया वह प्रभु सामने हैं लेकिन प्रभु की उपेक्षा रही है साधन नहीं कुछ रहस्य से होगा यहाँ भी  उदाहरण वैसेे तो अनेक है लेकिन अंतिम व तीसरा उदाहरण गोडिया गोस्वामी अग्रयगण्य श्री सनातन गोस्वामीपाद मदन मोहन जी के साक्षात वार्तालाप होता है । आज श्री मदनमोहन ने कहा बाबा तू इस आटे की बाटी मुझे रोज खिलाता है। मैं माखन मिश्री खाने वाला ग्वाल नन्द महाराज का पुत्र! तू कम से कम इस में नमक तो डाल दिया कर बिना नमक की बाटी कैसे  खाऊ मैं।

▶ बोले प्रभु प्रभु आज नमक मांगते हो ।कल चीनी। परसो माखन ।फिर कुछ और ।मैं ठहरा विरक्त बाबा तुम्हारी यह मांगे में कब तक कैसे पूरी करूँगा? मैं तो तुम्हारी ऐसी व्यवस्था में ही लगा रहूँगा तो भजन कब करूँगा? प्रश्न फिर वही कहा वहीं प्रभु के नमक की व्यवस्था क्या भजन नहीं ।कुछ तो रहस्य  होगा यहां भी। मेरे समझ में यह नहीं आता कि प्रभु का भजन प्रभु का गुणगान लीला गान साधन तो है ही ।साध्य भी है और प्रभु को भी परम प्रिय एवं सुख का प्रदाता भी है।प्रभु  अपनी उपेक्षा सहन कर लेते हैं ।लेकिन अपने भजन अपनी लीला गुण कथा करने वाले के वशीभूत रहते हैं। और तीनो उदाहरण  में प्रभु प्रसन्न ही दिखे।न सनातन प्रभु से रुष्ट हुये।ना पुण्डलिक से ।ना श्री गोपाल भट्ट जी के शिष्य से ।एक बात और है कि अपनी इस भूमि पर की हुई लीला कथाओं को श्री कृष्ण सपरिकर गोलोक में भी  इन्हें नियम से स्निग्ध कण्ठ और मधुकण्ठ से श्री गोपाल चम्पू के माध्यम से सुनते हैं।

▶ दूसरी बात यह भी है कि जिन्हें श्री कृष्ण प्राप्त है। उन्हें श्री कृष्ण प्राप्ति के पश्चात उनकी सेवा,उनका  का भजन उनकी गुण लीला गान द्वारा ही तो उन्हें प्रसन्न करना है ।इसलिये श्री कृष्ण प्राप्ति पर भी सन्त जन उनका भजन अथवा वह साधन कभी भी नहीं छोड़ते हैं जिनसे श्रीकृष्ण प्राप्त हुए। अतः सार का सार हुआ भजन। भजन। भजन। और भजनेर मधये श्रेष्ठ नवविधा भक्ति एवं नवविधा भक्ति पूर्ण नाम हेतै हय।

▶ नाम संकेत अन्य नाम का अर्थ श्री कृष्ण प्राप्ति पर भी नहीं छोड़ना है प्राप्ति से पहले छोड़ने का तो प्रश्न ही नहीं और छोड़ेंगे तो सबसे पहले पकड़ा हो और यदि नाम का आश्रय  ही नहीं लिया तो भैया- राधे राधे श्याम मिला दे।।

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚
 
▶ सम्पादकीय - श्रीहरिनाम पत्रिका (अंक 45/04/516 , अप्रैल 2015 )
 
श्रीहरिनाम पत्रिका (अंक 45/04/516 , अप्रैल 2015 ) Harinam