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Tuesday, 12 June 2018

Bhakti Course - Class ke lakshan | भक्ति कोर्स - क्लास के लक्षण

Bhakti Course - Class ke lakshan | भक्ति कोर्स - क्लास के लक्षण
Bhakti Course - Class ke lakshan | भक्ति कोर्स - क्लास के लक्षण 

🔰 भक्ति कोर्स 🔰
  क्लास के लक्षण

🔰 कक्षा 1⃣ : श्रद्धा
अर्थात मन-बुद्धि हृदय से स्वीकृति

🔰 कक्षा 2⃣ : वैष्णव संग
भजन करने वालों के साथ उठना।बैठना
और भजन। भगवान की बातें । घर
गृहस्थी की नहीं ।

🔰 कक्षा 3⃣ : भजन क्रिया
अर्थात 24 में से कम से कम 6 घंटे या
अधिक एकांत भजन में समय लगाना।

🔰 कक्षा 4⃣ : अनर्थ नाश
घर। परिवार के क्लेश या तो होंगे नहीं ।
होंगे तो हमारे चित्त पर प्रभाव नहीं
होगा उनका ।

🔰 कक्षा 5⃣ : निष्ठा
अर्थात दृढ़ विश्वास । पत्थर छाप।
अविचलित होकर भजन करना । संशय
की एक बूँद नहीं ।

🔰 कक्षा 6⃣ : रुचि
अर्थात घूम फिर कर बार बार भजन।
भक्ति । एडिक्शन ।

🔰 कक्षा 7⃣ : आसक्ति
भीषण एडिक्शन। जी न पाना। खा न
पाना। रह न पाना। भजन। भगवत्
चर्चा के बिना ।

🔰 कक्षा 8⃣ : प्रेम
श्रीकृष्ण के हृदय में विराजने योग्य
विशुद्ध सत्व की प्राप्ति और श्रीकृष्ण का
हृदय में होने का आभास सर्वथा
आभास । दर्शन । अनुभूति ।

🙏 समस्त वैष्णव वृन्द को मेरा सादर प्रणाम


🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

धन्यवाद!!
www.shriharinam.com
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Friday, 21 July 2017

शास्त्र पढ़ने ही पड़ेंगे

शास्त्र पढ़ने ही पड़ेंगे

​ ✔  *शास्त्र पढ़ने ही पड़ेंगे*    ✔

▶ तीन कृपा हैं । गुरु कृपा । शास्त्र कृपा । आत्म कृपा । इसमें से सर्व शुद्ध है ग्रन्थ कृपा ।

▶ ग्रंथ दोष रहित हैं । ग्रन्थ प्रभु के विग्रह हैं । ग्रन्थ हर समय । हर अवस्था में पढ़ सकते हैं ।

▶ ग्रंथ पढ़ते समय जिज्ञासा या प्रश्न भी उठते हैं, जिन्हें गुरुदेव से समझा  जा सकता है ।

▶ शास्त्र भी श्रद्धा सहित पढ़ते पढ़ते कृपा करते हैं
एक बार म् समझ नही आते । अपितु उतना ही समझ आते हैं जितनी साधक की स्तर होता है । दासाभास ने यह अनेक बार अनुभव किया ।

Sunday, 4 December 2016

Nitya Leela Pravesh

नित्य लीला प्रवेश


​​​✔  *​नित्य लीला प्रवेश*    ✔

▶ अथवा निकुंज लीला प्रवेश । निकुंज गमन । कुंज गमन । ऐसे शब्द हैं जो हम  प्राय प्रयोग करते हैं ।

▶ कुंज वह है जहां सखा एवं
सखियां दोनों का प्रवेश है ।

▶ निकुंज में केवल सखियों
का प्रवेश है और

▶ निभृत निकुंज में केवल मंजरियों का प्रवेश है । न सखियों का ना सखाओं का । इस गहराई को समझे रहना चाहिए ।

▶ दूसरी बात है नित्य लीला प्रवेश की ।
गुरुदेव नाम मंत्र अथवा गोपाल मंत्र देकर भक्ति का बीजारोपण कर देते हैं ।

▶ उस बीज को श्रवण कीर्तन और स्मरण के जल से सींचना होता है । उसको सीचने पर एक भक्ति पौधा उत्पन होता है और पौधे के साथ-साथ खरपतवार भी पैदा होती है पूजा प्रतिष्ठा एवं लाभ की ।

▶ हम भजन क्यों करें हमें क्या लाभ है ।
हम भजन करते हैं हमारी पूजा होनी चाहिए
हम भजन करते हैं हमारी प्रतिष्ठा होनी चाहिए ।

▶ यह खरपतवार ऐसी है कि, जो हम श्रवण कीर्तन स्मरण का जल देते हैं । इस खरपतवार को यदि उखाड़ कर फेंका नहीं गया तो यह खरपतवार उस श्रवण कीर्तन स्मरण रुपी जल से स्वयम को पुष्ट करती जाती है और भक्ति रूपी बेल या पौधा शिथिल हो जाता है और कही कभी नष्ट भी हो जाता है ।

▶ इसलिए भजन के साथ साथ हम इस बात की चेष्टा रखें कि कहीं खरपतवार तो नहीं हो गई, कहीं  खरपतवार  हमारे जल को अपनी पुष्टि के लिए प्रयोग तो नहीं कर रही ।

▶ श्रद्धा
▶ साधु संग
▶ भजन क्रिया
▶ अनर्थ निवृत्ति
▶ निष्ठा
▶ रुचि
▶ आसक्ति और
▶ भाव ।

▶ ये उस भक्ति बेल की सीढ़ियां हैं

▶ भाव पर पहुंच कर साधक को साक्षात दर्शन होने लगता है और मन ही मन जो प्रक्रियाएं वह करता है उसका प्रभाव पंच भौतिक स्थिति पर पड़ने लगता है, दिखने लगता है ।

▶ जैसे यदि मानसिक लीला में यह देखा गया कि प्रिया जी का कुछ रंग उड़ कर मेरे ऊपर आ गिरा है तो वास्तव में मेरे वस्त्र पर रंग गिरा दीखता है ।

▶ यह है भाव तक की स्थिति । भाव तक की प्रक्रिया इस पंच भौतिक देह से ही होती  रहता है । जैसे ही प्रेम उदित होता है यह पंच भौतिक देह पात हो जाता है ।

▶ फिर योगमाया इस सुक्ष्म शरीर को वहां ले जाती है जहा इस ब्रह्मांड में इस समय ठाकुर की नित्य लीला चल रही होती है ।

▶ वहां ले जाकर इस जीव को किसी परिकर भूत गोपी के गर्भ में स्थापित कर देती है । फिर यह जीव उस गोपी के गर्भ से जन्म लेता है और परिकर के रूप में कृष्ण की समस्त लीलाओं का दर्शन करता है । सहायता करता है । मंजरी सखी रूप में इसका लीला में प्रवेश होता है ।

▶ नित्य लीला में प्रवेश का यह शास्त्रीय क्रम है जो कि विश्वनाथ चक्रवर्ती पादने भक्ति रसामृत सिंधू बिंदु में वर्णित किया है ।

▶ नित्य लीला प्रवेश । यह गुड़ का चीला नहीं है जो लपेटा और खा गए । बहुत ही चेष्टा, भक्ति भजन गहराई से चिंतन आदि करने पर अगले शरीर में प्राप्त होता ह ।

▶ इस शरीर में साधक केवल भाव् तक ही पहुंच पाता है । और भाव तक  कितने पहुंचते हैं यह आप हम सभी जानते हैं । अतः लगे रहिये । ऊँची ऊँची बातें बनाने की अपेक्षा भजन म  लगिए । बहुत कठिन ह डगर पनघट की ।

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn​

Wednesday, 1 June 2016

भक्ति कोर्स

✅  भक्ति कोर्स  ✅

▶ भक्ति कोर्स की आठ क्लास
▶ एक ~ श्रद्धा
▶ दो ~ वैष्णव संग
▶ तीन ~ भजन करना
▶ चार ~ अनर्थ नाश
▶ पांच ~ निष्ठा
▶ छः ~ रुचि
▶ सात ~ आसक्ति
▶ आठ ~ प्रेम
▶ यह प्राप्त होते ही
▶ शरीर पात

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

भक्ति कोर्स
भक्ति कोर्स



भक्ति कोर्स
भक्ति कोर्स

Friday, 27 May 2016

भजन भक्ति

भजन भक्ति


✅ भजन भक्ति ✅

▶  वेसे तो 4 प्रकार के लोग भजन करते हैं

▶ 1 । दुखन से दुखी
▶ 2 । जानकारी के लिए
▶ 3 । कामना पूर्ति
▶ 4 । भजन के लिए

▶ ऊपर के 3 तो काम पूरा होने पर भजन छोड़ भी देते है । लेकिन भजन के लिए भजन करने वाले कभी नही छोड़ते ।

▶ भजन के लिए भजन अर्थात कृष्ण को सुख देने के लिए भजन
▶ अर्थात प्रेम ।

▶ इसका एक निश्चित क्रम है

▶ 1 । श्रद्धा
उत्पन्न होती है कृष्ण में या भजन में
▶ 2 । साधू संग
कृष्ण प्रेम में जो लगे हैं ।भजन में जो लगे हैं उनका संग होता ह
▶ 3 । भजन प्रारम्भ
वे वैष्णवजन भजन की शिक्षा देकर भजन में प्रवेश कराते हैं

▶ भजन में प्रवेश होते ही
1 । दैन्य आता ह या अहम जाता ह
2 । जितने भी क्लेश हैं वे धीरे धीरे समाप्त होते हैं ।

▶ अब जो लोग कहते हैं कि घर वाले भजन नही करने देते । क्लेश करते हैं । वे अच्छी तरह समझ लें यदि क्लेश समाप्त होने की बजाय बढ़ रहे हैं तो वे भजन नही । व भजन क नाम  पर

▶ 1। अपने दायित्वों से भाग रहे हैं
▶ 2। अपनी भक्त होने की इगो
▶ 3। भजन क नाम पर दादागीरी
▶ 4। या कुछ और कर रहे हैं

▶ मोटी बात क्लेश है तो भजन नही और भजन होगा तो क्लेश नहीं  । अतः भजन करिये भजन ।दैन्य सहित भजन । क्लेश छु मन्तर

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚



Thursday, 27 September 2012

251. shraddhaa


श्रद्धा 

श्री कृष्ण - प्रेम प्राप्त करने की प्रथम सीढी है श्रद्धा
अनेक प्रकार की श्रद्धा का वर्णन शास्त्र में मिलता है

श्री कृष्ण की पूजा करने से समस्त देवताओं की पूजा 
हो जाती है, किसी और की पूजा की कोई आवश्यकता ही
नहीं रह जाती है

जैसे पेड़ की जड़ में जल देने से उस पेड़ के ताना, शाखा, फूल, फल
सब तृप्त हो जाते हैं, सबको अलग-अलग जल देने की ज़रुरत नहीं है

-ऐसी यह श्रद्धा ही कृष्ण प्रेम प्राप्ति की प्रथम सीढ़ी है
इस श्रद्धा के बाद-
साधुसंग
भजन करना
अनर्थों की समाप्ति
निष्ठा
रूचि
आसक्ति
भाव
एवं अंत में प्रेम की प्राप्ति हो जाती है
JAI SHRI RADHE
DASABHAS Dr GIRIRAJ NANGIA