Tuesday, 23 August 2016

फिर मज़बूरी क्या है जी

​✔ *फिर मज़बूरी क्या है जी*   ✔

➡ हमारे जीवन में हमें अनेक प्रकार के लोग मिलते हैं । किसी किसी से हमारा स्वभाव मिल जाता है और किसी किसी से हमारा स्वभाव बिल्कुल नहीं मिलता है

➡ जिन स स्वभावं मिल जाता है वह तो ठीक हैं । हमारे जीवन में अनुकूलता प्रदान करते हैं इससे हम आनंदित रहते हैं

➡ लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन से स्वभाव नहीं मिलता है और वह हर समय हमें मानसिक रुप से मतभेद होने के कारण परेशानी सी पैदा करते हैं

➡ विचार न मिलने वाले ऐसे कुछ लोग यदि हमारे रिश्तेदार हैं, हमारी माता है, हमारे पिता है, हमारा पुत्र है, पत्नी है, भाई है, बहन है, मामा है चाचा है, आदि आदि । 

➡ तब तो फिर भी हमारी कुछ मजबूरी है कि हम उन से संबंध बनाए रखें और उनको झेलते रहे क्योंकि उनसे एक ऐसा अकाट्य संबंध है जो चाहने पर भी तोड़ा नहीं जा सकता

➡ तो इस मजबूरी को झेलना ही पड़ता है और एक बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसे लोगों को बेमन से अपने मतलब जितना जीना ही पड़ता है और जीना भी चाहिए इसी को जीवन का संतुलन या सामंजस्य कहते हैं

➡ लेकिन

➡ आजकल सोशल मीडिया पर चाहे टेलीग्राम हो whatsapp हो facebook हो या दूसरे साधन हो हमारे अनेकानेक मित्र बन जाते हैं

➡ जिन से लेना एक न देना दो । ना वह हमारे भाइयों में से हैं ना बहन होते हैं ना मां होते हैं ना बेटी होते हैं लेकिन उनसे कहीं ना कहीं हमारा थोड़ा बहुत स्वभाव मिल जाता है

➡ वह हमें हम उनको अच्छे लगने लगते हैं । प्रारंभ में तो कुछ शिष्टाचार । कुछ व्यवहार निर्वाह । कुछ वाक् पटुता ।  कुछ व्यवहार कुशलता से एक दूसरे को अच्छे लगने का क्रम चलता रहता है

➡ बाद में कभी-कभी हमें पता चलता है कि हमारा और उसका स्वभाव एक जैसा नहीं है । परस्पर अब सम्मान भी नहीं रहा । प्रेम भी नहीं रहा । एक दूसरे को क्रिटीसाइज करना और एक दूसरे पर विवाद करना आक्षेप करना इत्यादि रह गया

➡  और

➡ इससे हम अनावश्यक तनाव में रहते हैं टेंशन में रहते हैं हमारी चेष्टाएं भी बार बार उधर जाती हैं के देखें क्या हुआ क्या लिखा ऐसे में विवेक का परिचय देते हुए ऐसे लोगों से  तुरंत ही दूर हो जाना चाहिए

➡ क्योंकि इनके साथ हम व्यवहार निर्वाह करते रहें ऐसी कोई भी मजबूरी नहीं है एक भावना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है

➡ शास्त्र तो कहता है
राम जाके प्रिय न राम वैदेही
तजिए ताहि कोटि वैरी सम यद्यपि परम स्नेही

➡  और इसके उदाहरण में माता का पिता का भाई का त्याग शास्त्र का आदेश है । चलिए हम माता पिता भाई पति पत्नी का त्याग न कर पाएं तो ऐसे अनावश्यक फालतू लोगों का त्याग हमें तुरंत कर देना चाहिए जो हमारे मानसिक संतुलन बुद्धि विवेक को डिस्टर्ब करते हैं और हम उनसे एक अलग तरह की परेशानी से बंध जाते हैं

➡ उस बंधन को तुरंत तोड़ कर हमें अपने मुख्य लक्ष्य भगवत भजन की ओर लगना चाहिए अन्यथा यह डिस्टरबेंस मन मस्तिष्क को परेशान करती है और चिंतन या भजन नहीं बन पाता है

➡ और हम यहाँ आये तो भजन क लिए थे । लेकिन ओटन लगे कपास ।

समस्त वैष्णव जन को मेरा सादर प्रणाम

 🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

फिर मज़बूरी क्या है जी

Monday, 22 August 2016

ग्रन्थ परिचय - श्रीशिक्षाष्टक

📖   ग्रन्थ      परिचय  2⃣ 1⃣ 📖

💢 ग्रन्थ  नाम : श्रीशिक्षाष्टक 

💢 लेखक : महाप्रभु श्रीचैतन्य   
     
💢 भाषा : संस्कृत मूल व  हिन्दी
    
💢 साइज़ : 12 x 18  सेमी
💢 पष्ठ  : 48 सॉफ्ट बाउंड
💢 मल्य : 15 रूपये

💢 विषय वस्तु :
      श्रीचैतन्य महाप्रभु के मुख से निःसृत
      श्रीप्रेमामृतरसायनस्तोत्र, श्रीराधारसमंजरी
      श्रीयुगलपरिहारस्तोत्र एवं श्रीजग्न्नाथदशक    

💢 कोड : M021-Ed2

💢 पराप्ति  स्थान

1⃣ खण्डेलवाल बुक स्टोर वृन्दाबन
2⃣ हरिनाम प्रेस वृन्दाबन
3⃣ रामा स्टोर्स, लोई बाजार पोस्ट ऑफिस

📬 डाक द्वारा । 09068021415
      पोस्टेज फ्री

📗🔸📘🔹📙🔶📔

श्रीशिक्षाष्टक 

अंतर

​​✔  *अंतर*  ✔ 
➡ श्री राम रूप में प्रभु ने अस्त्र । शस्त्र
धारण कर असुरों को मारा
➡ श्री कृष्ण रूप में प्रभु ने
व्रज में अनेक असुर तो मारे
लेकिन अस्त्र नहीं उठाया ।
हाँ द्वारका मथुरा में अस्त्र उठाया
➡ श्री चैतन्य महाप्रभु रूप में प्रभु ने
न तो अस्त्र उठाया
न किसी को मारा ही । अपितु
जो भी दुष्ट थे उन्हें
प्रेम प्रदान कर वैष्णव बना दिया ।
जेसे क़ाज़ी । जगाई माधाइ ​

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

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Wednesday, 17 August 2016

दिल में और दुआ में


✔  *दिल  में और दुआ में*  ✔

प्रभु जी
ये कितना सही है
दुनिया में रहने की सबसे अच्छी दो जगह ‘किसी के दिल में’ या ‘किसी की दुआओं में’ !!
कृपया समझाएं

Tuesday, 16 August 2016

ईमानदारी

✔  * ईमानदारी*  ✔

अपने कर्तव्यों को
ईमानदारी से करना धर्म है ।

और सबसे बड़ा कर्तव्य है
भगवान की भक्ति करना । ये भी
ईमानदारी से । इसलिए इसे
परम धर्म कहते है । और जो ईमानदारी से
परम धर्म करता है वह धर्म तो
करता ही है । ठीक वेसे
जेसे इंटर पास व्यक्ति ने कक्षा 5 तो
पास की ही होती है ।

एक वैष्णव नित्य कृष्णदास

✔  *एक वैष्णव नित्य कृष्णदास*  ✔

एक वैष्णव
यदि
 उसे अपना
नित्य कृष्णदास
स्वरूप याद
रहता है तो 


वह
आशीर्वाद कैसे
दे सकता है


वो तो दास है
यदि देता है तो
वह भूल गया है
वैष्णव तो सदा
यही कहता है
प्रभु तुम पर कृपा
करें ।

क्या सोचते हैं
आप

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚
🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

एक वैष्णव नित्य कृष्णदास



Monday, 15 August 2016

श्री राधा रानी ब्रज की रखवारी

जय हो
  श्री राधा रानी के व्रज रखवारी
के बारे में एक फैक्ट और भी है
जो बहुत जन जानते है
और बहुत नही जानते ।
वृन्दाबनं में जो शासन है
प्रशासन है उसकी अधीश्वरी
श्रीराधा रानी हैं ।
 एक बार इस विषय में
सब सखा सखियों में
बहस छिड़ गयी कि राजा कौन ।
सखा बोले नंदलाल
श्रीकृष्ण ही राजा हैं । और कौन ।
सखिया बोली । राजा हैं
हमारी राधा रानी ।

सखा एवम् सखियों की सभा हुई

सबने अपने अपने तर्क रखे ।
कृष्ण एवम् सखा हार गए ।
हार स्वीकार की । एवम् सर्व सम्मति
से स्वयं कृष्ण एवम् सखाओं ने
श्री प्रिया जी का तिलक व
राज्याभिषेक किया ।
तब से श्री राधारानी ही
ब्रज की रानी हैं ।
प्रशासक हैं । व्रज रखवारी हैं ।
 इस पूरी लीला का वर्णन
माधव महोत्सव नामक ग्रन्थ में
श्री जीव गोस्वामी जी ने किया है ।
प्रामाणिक ग्रन्थ है । काल्पनिक नहीं ।
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 ॥ जय श्री राधे ॥ 
 ॥ जय निताई  ॥ 
 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn