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Thursday, 8 September 2016

पाप क्यों करते हैं हम

🦀 पाप क्यों करते हैं हम 🦀

🐌 पराय हम सभी लोग इस संसार में रहते हुए पाप करते ही हैं । पाप भी अनेक प्रकार के हैं

कुछ पाप मन से होते हैं
कुछ वाणी से होते हैं
कुछ शरीर से होते हैं
कुछ धन से होते हैं

Monday, 16 May 2016

मन । वचन । कर्म

मन । वचन । कर्म


✅ मन । वचन । कर्म ✅

▶सबसे पहले मन में विचार आता ह फिर वाणी में आता हैहमे ऐसा करना चाहिए फिर हम उसे करते हैं ।

▶जो मन म नही ह । वो प्राय होता नही कभी कभी होता तो हम कहते हैं

▶ये तो कभी सोचा ही नही था

▶ मन में विचार शुद्ध आएं । अच्छे आएं इसके लिए भोजन । संग शुद्ध रखना होगा

▶अच्छे आएं तो तुरंत करो बुरे आएं तो टालो

▶कुछ विचार ऐसे भी होते हैं जिन्हें कहने की ज़रूरत नही । शुरू करो ।

▶ जेसे कोई आपको ठग रहा था । आपको समझ आ गया । अब उसे कहो मत कि मुझे समझ आ गया । समझ जाओ और सम्भल जाओ ।

▶ ये तो हुई लाइफ स्टाइल । अब मन वचन कर्म इन तीनो से जो एक होकर भजन करता है । वह संत होता है ऐसे विरले हैं । में तो नही हूँ । आप की आप जानें

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚



Sunday, 27 November 2011

150. samdarshi


samdarshi


समदर्शी
जिसने अपने मन एवं इन्द्रियों को वश कर लिया हो  
राग द्वेष, दुःख सुख, हानी लाभ जीवन मरण मैं सामान रहता है, 
न दुःख मै व्याकुल होता है,न सुख मैं फूलता है, 
उसका अंत: करण सदैव ही प्रसन्न रहता है

एसा प्रसन्न अंत:करण वाला व्यक्ति को विषयों से विचरना  भी पड़ता  है तो 
उसका दुस्प्रभाव क्रोध आदि उसे नहीं होता है
और अपने भजन - साधन पर केन्द्रित होता हुआ शीघ्र ही वह प्रभु-कृपा को प्राप्त कर लेता है 


JAI SHRI RADHE - RADHE


Wednesday, 9 November 2011

134.संतुलन

some rare pics of shri shyamdas ji



मन द्वारा इन्द्रियों को वश मैं करके 
एक साधक सदैव मेरा भजन करता रहता है 
लेकिन मन का यह वशीकरण सतुलन से ही प्राप्त होता है 

न ज्यादा खाने वाले को, न बिलकुल न खाने वाले को,
न बहुत सोने वाले को, न बहुत जागने वाले को 
यह वशीकरण करना संभब नहीं है | 

जीवन के हर क्षेत्र मैं संतुलन बनाये रखने
वाले ही मन को  नियंत्रित करके इन्द्रियों को वश मैं कर लेते हैं

JAI SHRI RADHE

DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban

Saturday, 29 October 2011

127. ऑटो मोड





जो बुद्धि द्वारा मन को
और मन द्वारा इन्द्रियों को वश में कर लेता है
वह ऑटो मोड में आ जाता है
वह राग-द्वेष, हानि-लाभ, दुःख-सुख में सामान भाव वाला हो जाता है

वह खाता भी है, सूँघता भी है, बोलता भी है
त्यागता भी है, ग्रहण भी करता है
देखता भी है, सुनता भी है
यानि उसकी सब इन्द्रियां सब काम करती हैं
और वह इनके प्रभाव से परे रहकर इस प्रकार सोचता हुआ 
शांत रहता है क़ि - 'ये इनका काम है :अतः कर रही हैं
मुझे इनसे क्या लेना - देना ???

ऑटो मोड़ में इस प्रकार आने पर उसकी सम्पूर्ण चेष्टा
प्रभु की अनुकूल्तामयी सेवा में ही लग जाती है
और वह प्रभु की प्रेमा-भक्ति को प्राप्त कर लेता है

JAI SHRI RADHE

DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban