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Saturday, 22 July 2017

Suksham Sutra Part 45

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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
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🔮 भाग 4⃣5⃣

💡 भगवान की कृपा से मनुष्य जन्म प्राप्त होता है और उनकी अति कृपा से भक्ति प्राप्त होती है .

💡 भगवदीय आचरण में संलग्न रहने पर अधिक पूजे जाऔगे, यह ऐसे ही है जैसे हाथी पर भगवान की सवारी निकले और सब लोग उन्हें प्रणाम करें - इस पर हाथी ये समझे कि लोग मुझे प्रणाम कर रहे हैं, यह उसका भ्रम ही तो है, अतः भगवत कृपा को अपना पुरुषार्थ मान अहंकार करना क्या भूल नहीं है?

Saturday, 10 March 2012

189. kaam




 काम 

स्रष्टि मैं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो काम यानी कामना | इच्छा | चाहे वह
शरीर सुख भोग से सम्बंधित हो या यश, मान, प्रतिष्ठा, भोतिक सुख सुविधाओं से सम्बंधित हो,

जीवन भर अपनी कामनाओं की पूर्ति मैं येन केन प्रकारेण लगे रहते हैं 
इसके लिए वे धन कमाते भी है और धन मारते भी हैं, ऋण  भी लेते हैं | अन्याय अधर्म करते हैं |

कैसे भी ये इच्छा पूरी हो बस ! 
लुट जाएँ, पिट जाएँ, ऋणम कृत्वा घ्र्तम पिबेत

कामना भी एक एसी चीज है कि एक पूर्ण हुई, दूसरी खड़ी हो गई | 
दूसरी पूर्ण हुई, तीसरी खड़ी हो गई कामनाओं का अंत नहीं है | 

अर्थ - धर्म - काम ये तीन प्रवत्तिपरक   हैं | 
आगे मोक्ष् पर विचार करेंगे |

धर्म पूर्वक 
अर्थ उपार्जन करके अपनी उचित 
कामनाओं को पूर्ण कर उनसे 
मोक्ष पाना ही बहुत नहीं  है

इसके आगे भी है , कल चर्चा करेंगे.

JAI SHRI RADHE
DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia

kaam, काम

Friday, 2 March 2012

187. dharm, arth, kam, moksh



धर्म अर्थ काम मोक्ष 

धर्म अर्थ काम ये तीनों प्रवत्तिपरक पुरुषार्थ कहे गए हैं 
पुरुशार्थ यानि पुरुष होने का अर्थ या लक्ष्य या  पुरुष को क्या प्राप्त करना है 
जिससे उसका पुरुष होना या जीवन सफल मन जाय |

१. धर्म - अपने आश्रम,गृहस्थ या वानप्रस्थ या ब्रहमचर्य या संन्यास के धर्मों नियमों का पालन करना |
 अपनी जाती - ब्राह्मन, वैश्य, क्षत्रिय,शुद्र के धर्मों का पालन करना, सदचार्य, दान 
सत्कर्म करना - साधारनतया धर्म कहलाता है
इसका पालन करने वाले को स्वर्ग प्राप्त होता है |
ज्यादा धर्म करने वाले को स्वर्ग मैं ज्यादा सुविधाए कम वाले को कम सुविधाए दी जाती हैं | 
फल भोगने के बाद उसे पुन: नीचे के लोकों मैं गिरा दिया जाता है | 

धर्म अर्थ काम मोक्ष्य : चारों का भगवान् के सुख, भगवान् की अनुकूलता, भगवान् की भक्ति से सीधा सम्बन्ध नहीं है |
 न ही ये भक्ति के अंग हैं | 
भक्ति - भजन, वह भी विशुद्ध एक प्रथक चीज है | 

आगे एक दो दिन में  अर्थ पर विचार करेंगे |

JAI SHRI RADHE
DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia
www.shriharinam.com