Monday, 13 November 2017

Kripa


✔ *कृपा * ✔

▶ एक अध्यापक कभी नहीं चाहता कि उसके क्लास का एक भी बालक फेल हो, अपितु वह यह चाहता है की सभी अधिकाधिक नंबर प्राप्त करें ।

▶ लेकिन उसके चाहने से कुछ नहीं होता विद्यार्थियों का परिश्रम ही उसका कारण बनता है ।

▶ जो जितना परिश्रम करता है, जो जितने लगन से पड़ता है, उसको उसकी परिश्रम लग्न एवं योग्यता के अनुसार अंक प्राप्त होते हैं ।

▶ इसी प्रकार कोई भी गुरु देव नहीं चाहते कि मेरा शिष्य भगवत भजन में असफल हो । वे तो यही चाहते हैं कि सभी परम भक्त बन जाए ।

▶ लेकिन ऐसा नहीं होता । जो वैष्णव, जो शिष्य जितना भजन में इनपुट देते हैं वह उसी स्तर के भक्त बनते हैं ।

▶ अतः कृपा प्राप्ति के लिए आवश्यक है परिश्रम हम जितना परिश्रम करते हैं जितना इनपुट देते हैं, उतनी ही कृपा हमें प्राप्त होती है ।

▶ कृपा ना तो गुरुदेव के वश में है । ना भगवान के ही वश में है । कृपा का साक्षात स्वरुप है श्री राधा रानी ।

▶ और श्री राधा रानी के चरणों की सेवा करते रहते हैं श्रीशाम सुंदर । अतः हम अधिक से अधिक साधन करते हुए भजन में लगे ।

▶ जितने अधिक लगेंगे उतनी अधिक कृपा होगी और जितनी अधिक कृपा होगी उतने ही शीघ्र हम अपने जीवन के उद्देश्य प्रिया प्रीतम के चरणों की सेवा को प्राप्त कर लेंगे ।

▶ अतः सावधान कृपा यदि नहीं हो रही है तो कमी गुरुदेव या भगवान की नहीं हमारे ही प्रयास और परिश्रम में कमी है । और प्रयास करें, और परिश्रम करें । कृपा तो प्राप्त होनी ही है होगी ही

समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Sunday, 12 November 2017

Kinkri Sewa

​​✔ *किंकरी  सेवा * ✔

▶ आज अचानक में अपने एक सत्संगी मित्र की कुटिया पर गया । मैंने देखा छोटी सी कुटिया थी वह मित्र ठाकुर जी की सेवा कर रहे थे ।

▶ उसके बाद उन्होंने तुलसी जी को जल दिया । स्वयं बर्तन मांज, झाड़ू लगाई, पोछा लगाया,  आदि ।

▶ इस प्रकार अन्य साफ़ सफाई आदि करके मेरे साथ स्थिर हो कर माला लेकर बैठ गए ।

▶ मैंने उनसे कहा आप तो समर्थवान हैं । आप एक बाई या नौकर रख लीजिए, जो यहां झाड़ू कर देगा, पोछा लगा देगा, बर्तन धो देगा, छोटी-मोटी सफाई कर देगा ।

▶ हां ठाकुर सेवा, तुलसी सेवा आप स्वयं करिए । वे तपाक से बोले ! दासाभास । कैसी बात करते हो ।

▶ जीव का स्वरुप क्या है । यह बताओ । मैंने कहा कृष्णदास या अपने गौड़ीय परंपरा में राधा जी की दासी ।

▶ तो बोले, राधा जी की दासी हम तभी बन पाएंगे ना जब हम इस लौकिक संसार में भी दासियों जैसा काम करेंगे ।

▶ हमें दासियों जैसा काम करने की आदत रहेगी, संस्कार रहेंगे तभी तो वहां जाकर हम दासियों जैसी सेवा कर पाएंगे ।

▶ यदि हम जीवन भर रिमोट के बटन दबाते रहे तो प्रिया जी की निकुंज में बूहारी सेवा कैसे करेंगे ।

▶ प्रिया जी के लिए माला कैसे गूठेंगे । प्रिया जी को जल कैसे प्रदान करेंगे । अतः यह बहुत आवश्यक है कि हम यहां से ही इन छोटी-छोटी सेवाओं का अभ्यास करें ।

▶ और यह निश्चित है कि निकुंज में हमें यह छोटी-छोटी सेवाएं ही प्राप्त होनी है, यदि अभ्यास नहीं होगा तो वहां यह सेवाएं कैसे कर पाएंगे ।

▶ अतः मैं अभी से इनका अभ्यास कर रहा हूं, जिससे आगे चलकर मुझे परेशानी न हो ।

समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚
🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Shri Krishan ka Avirbhav


श्री कृष्ण का आविर्भाव

अर्चा विग्रह
संत सद्गुरु
नाम
धाम
श्रीमद्भागवत

इन पांच वस्तुओं में भगवान श्रीकृष्ण का सदा आविर्भाव रहता है अथवा यूं कहें कि यह पांचों श्री कृष्ण का ही स्वरुप है ।

पहला है अर्चा विग्रह

अर्थात वह विग्रह, जो आपके घर के मंदिर में विराजमान हैं और आप उसका अर्चनं वंदनं पूजन सेवा आदि करते हैं । वह कोई शो पीस नहीं । सदा ये भाव रहे कि कृष्ण यहाँ विराजमान होकर हमारी सेवा स्वीकार कर रहे हैं ।

दूसरा है संत सदगुरु

विशेषकर सद्गुरु । सद्गुरु वह होते हैं जो शिष्य को सिर पर हाथ रखकर आत्मसात कर लेते हैं अर्थात शिष्य की भजन क्रिया आदि से प्रसन्न होकर शिष्य के प्रति उनमें आत्मीयता हो जाती है । वह सद्गुरु होते हैं । अन्यथा गुरु होते हैं ।

तीसरा है नाम

श्रीहरिनाम, श्री कृष्ण नाम, श्री राम नाम। भगवान का नाम भी साक्षात श्रीकृष्ण ही है । साक्षात भगवान ही है । नाम में भी सदा श्री कृष्ण का आविर्भाव रहता ही है अपितु नाम को कृष्ण से भी बड़ा कहा गया है ।

चौथा है धाम

कृष्ण के लिए श्री वृंदावन धाम । राम के लिए श्री अयोध्या धाम । धाम भी श्री कृष्ण का ही स्वरुप है । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि यदि धाम वास प्राप्त हो गया तो समझो श्रीकृष्ण मिल गए ।

धाम में भी कृष्ण का आविर्भाव है । धाम भी साक्षात श्री कृष्ण का ही स्वरुप है । यदि धाम को छोड़कर हम बार बार भाग रहे हैं तो धाम प्राप्त होने पर भी भागना इससे बड़ी कृष्ण उपेक्षा नही हो सकती ।

पांचवां है श्रीमद्भागवत ग्रंथ रत्न

श्रीमद्भागवत ग्रंथ रत्न में उपरोक्त चारों के विषय में चर्चा की गई है । अर्चा विग्रह, संत सद्गुरु, नाम, और धाम । इसीलिए श्रीमद्भागवत ग्रंथ रत्न में भी सदैव श्रीकृष्ण का आविर्भाव रहता है  ।

यहां मैं कहता चलूँ श्रीमदभगवदगीता में कृष्ण का आविर्भाव शास्त्र में नहीं कहा गया है । क्योंकि उसमें इन चारों की चर्चा नहीं है  ।

जितने भी ग्रन्थ है वह प्रभु के श्री विग्रह ही है  लेकिन श्रीमद् भागवत साक्षात श्रीकृष्ण ही है अतः जब भी हम इन पांचों का सेवन करें तब मन में यह दृढ़ विश्वास रहे कि हम श्रीकृष्ण का सेवन कर रहे हैं ।

समस्त वैष्णवजन को दासाभास का  प्रणाम
जय श्री राधे जय निताई 

Saturday, 11 November 2017

Bihari Ji Mandir me kyo hota hai parda baar baar

क्यों करते है बिहारी जी मन्दिर में बार बार पर्दा

धन्यवाद!!
जय श्री राधे !!
जय निताई !!
श्री हरिनाम प्रेस, वृन्दावन ।।
www.shriharinam.com
संतो एवं मंदिरो के दर्शन के लिये एक बार जरूर visit करे ।।।

Tuesday, 7 November 2017

दासाभास लेखनी भाग 7

दासाभास लेखनी


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             दासाभास लेखनी
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💎 भाग 7⃣

1⃣ ।। सब एक ही बात नहीं है ।।
अपनी साधना में जो सिद्ध हो चुके हैं ऐसे शांतरस के साधक - सिद्ध लोक को
दास्य भाव के साधक - वैकुण्ठ लोक को
शुद्ध सख्य- वात्सल्य- मधुर भाव के साधक गोलोक में जाते हैं। उपासना एवं भाव से अलग-अलग लोकों की प्राप्ति होती है.

2⃣ आम आदमी सांप को मार सकता नहीं। सपेरा मार सकता है, लेकिन मारता नहीं। उसके विषदन्त निकाल कर खेलता है ऐसे ही कामना वासना को मारो नहीं, उनमें से संसार-विषय विष निकाल कर उन्हें श्रीकृष्ण सेवा में लगा कर खेलो और आनंदित रहो.

3⃣ बन्दूक - जिस प्रकार एक गोली अपनी बन्दूक द्वारा प्रयोग करने पर ही काम करती है। उसी प्रकार मंत्र या भजन गुरुदेव द्वारा प्राप्त होने पर, उनके आनुगत्य में करने पर ही फल देता है। यदि भजन शुरू हो भी जाए तो पहले गुरुदेव मिलेंगे। फिर भजन का फल श्रीकृष्ण-सेवा मिलेगी वैसे ही जैसे यदि गोली मिल जाय तो बन्दूक खरीदनी पड़ेगी और बन्दूक मिल जाय तो गोली भी चाहिये।

🔔 ।। जय श्री राधे ।। 🔔
🔔 ।। जय निताई  ।। 🔔

🖋लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Sunday, 5 November 2017

Shri Ram Shri Krishan


श्रीराम श्रीकृष्ण

श्री राम हों या श्री कृष्ण हों, वामन हों,  नृसिंह हों, या श्री कृष्ण के अनेक स्वरुप श्री राधारमण हों, श्री बिहारी जी हों, श्री राधावल्लभ हों, श्री गोविंद देव आदि हों, यह सब एक ही स्वरुप है।

यह सब एक ही हैं । इनमें तत्वतः कोई भेद नहीं, ठीक वैसे जैसे बीए हो, बीकॉम हो, बीएससी हो बीसीए हो यह सभी ग्रेजुएट डिग्रियां हैं ।

लेकिन जब हम निश्चित कर लेते हैं कि हमें बीकॉम करना है तो हम बी कॉम की कक्षा में जाते हैं, बीकॉम की पुस्तकें पढ़ते हैं, बीकाम की ही कोचिंग लेते हैं और बीकॉम में पढ़ने वाले अपने साथियों का संग करते हैं ।

इसका अर्थ बीसीए या बीएससी की निंदा नहीं, उपेक्षा नहीं लेकिन केंद्र एक पर ही है ।

थोड़ा-थोड़ा अंतर भी इनमें होता है । बीकॉम करने वाला कभी डॉक्टर नहीं बन सकता । इसलिए उपासना के रूप में जब हम इन भगवान के विभिन्न स्वरूपों को देखते हैं तो यहां भी थोड़ा थोड़ा अंतर है ।

नरसिंह की उपासना और कृष्ण की उपासना और श्री राम की उपासना तीनों में अंतर है और उपासना के फल में भी अंतर है ।

श्रीकृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं
राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और
नरसिंह ने प्रहलाद की रक्षा की

इसलिए जब हम दीक्षित हो गए तब इष्ट रूप में हमें अपने गुरु परंपरा से प्राप्त श्री विग्रह के स्वरूप को ही सदा देखना चाहिए ।

उसी विषय के ग्रंथ पढ़ने चाहिए , उसी विषय के वैष्णवों का संग करना चाहिए, अपमान तो प्राणी मात्र का नहीं करना है फिर यह सब तो भगवान है ।

जब तक उपासना में अनन्यता नहीं आएगी तो इष्ट के प्रति दृढ़ बुद्धि एवं समर्पण नहीं आएगा और दृढ़ निष्ठा एवं समर्पण ना होने से प्राप्ति में बहुत विलंब होगा ।

अतः अनन्यता पूर्वक यथासंभव अधिक से अधिक अपने

इष्ट के विषय में बात करें ।
इष्ट के विषय में चिंतन करें ।
इष्ट का दर्शन करें
इष्ट के आचार्यों से मिले

तो हम शीघ्र ही इष्ट की कृपा प्राप्त कर उनके चरणों की सेवा प्राप्त कर लेंगे

समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚
🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Shringaar Vatt Vrindavan

Shringarvatt

✔  *श्रृंगार वट* ✔

▶ वृन्दाबन की परिक्रमा मार्ग में इम्लितला से 5वीं जीर्ण शीर्ण बिल्डिंग है । प्राचीन सिद्ध स्थान है ।

▶ यह लगभग जमुना के तट पर स्थित है । कभी इसके घाट पर यमुना जी भी बहती थी । रास लीला में जब श्री राधा जी चली गई तब श्री राधा जी का इस स्थान पर ठाकुर ने श्रृंगार किया था ।

▶ इसलिए इसका नाम श्रृंगार वट है । साथ ही जब नित्यानंद प्रभु आए तब नित्यानंद प्रभु ने भी यहां पर वास किया था ।

▶और आज भी यहां नित्यानंद प्रभु के वंशज उनके पुत्र के पुत्र के पुत्र के पुत्र यही विराजमान हैं ।

▶ श्रीनित्यानंद प्रभु के वंशज और उनके शिष्य उनका वंश आज भी श्रृंगार वट में विराजमान है

▶ श्री श्रृंगार वट सप्त देवालयों की गुरु गद्दी है । क्योंकि यह नित्यानंद प्रभु का स्थान है । सप्त देवालय गोस्वामी पाद के स्थान हैं ।  रूप,  सनातन श्री जीव श्री गोपाल भट्ट आदि ।

▶ नित्यानंद  प्रभु है । इसलिए यह गुरु गद्दी है लेकिन समय के प्रभाव से जीर्ण शीर्ण अर्थहीन ऐश्वर्य हीन होने से अब यहां कोई इसको पूछता नहीं है । स्वाभाविक भी है ।

▶ लेकिन यह स्थान सिद्ध है ।

▶प्रिया जी का यहां ठाकुर ने श्रृंगार किया है
और नित्यानंद प्रभु के यहां पर चरण पड़े हैं
नित्यानंद प्रभु के वंशज यहां आज भी विराजमान हैं

▶ यहां निताई गौर और प्रिया प्रीतम के दुर्लभ विग्रह हैं । सेवा पूजा आज भी विधि विधान से श्रद्धा पूर्वक होती है ।

▶ जो अंतरंग भक्त हैं, वैष्णव है । वह नियम से प्रतिदिन यहां दर्शन करते हैं । बहुत बड़ा प्रांगण दर्शनीय है । अवश्य दर्शन करना ही चाहिए

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn