Showing posts with label Shri Krishan. Show all posts
Showing posts with label Shri Krishan. Show all posts

Monday, 2 April 2018

श्री गुरुदेव हैं श्री कृष्ण के दास



✔  *श्री गुरुदेव हैं श्री कृष्ण के दास*    ✔

▶ ऐसे शास्त्र वाक्य, जिनमें गुरु को साक्षात भगवत्स्वरूप कहा गया है,  समष्टि-गुरु से संबंधित है, व्यष्टि-गुरु से नहीं ।
व्यष्टि गुरु तो स्वरूपतः कृष्ण दास होते हैं। उन्हें स्वयं भगवान या विषय विग्रह मानना भक्ति-शास्त्र और श्रीमन्महाप्रभु द्वारा अनुमोदित भक्ति पथ के विरुद्ध है ।
 ▶ उन्हें भगवान से अभिन्न इसलिए  कहते हैं कि वे भगवान के प्रिय होते हैं और उनमें भगवान की शक्ति का प्रकाश होता है-  शिष्य को शिक्षा-दीक्षादि देने के समय भगवान उनमें अपनी शक्ति संचारित करते हैं ।

▶ गुरु और भगवान स्वरूपतः एक नहीं हैं, यह स्वयं भगवान श्री कृष्ण की अपनी उक्ति से सिद्ध है । उन्होंने कहा है-  "पहले गुरुदेव की पूजा करके फिर मेरी पूजा करनी चाहिए ।
जो इस प्रकार करते हैं वे ही सिद्धि लाभ करते हैं ।"
यदि गुरुदेव भगवान से भिन्न न होते तो आगे-पीछे गुरु और भगवान की पूजा करने का कोई अर्थ न होता।

समस्त वैष्णववृन्द को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज
LBW - Lives Born Works at vrindabn

धन्यवाद!!
www.shriharinam.com
संतो एवं मंदिरो के दर्शन के लिये एक बार visit जरुर करें !!
अपनी जिज्ञासाओ के समाधान के लिए www.shriharinam.com/contact-us पर
क्लिक करे।।

Sunday, 12 November 2017

Shri Krishan ka Avirbhav


श्री कृष्ण का आविर्भाव

अर्चा विग्रह
संत सद्गुरु
नाम
धाम
श्रीमद्भागवत

इन पांच वस्तुओं में भगवान श्रीकृष्ण का सदा आविर्भाव रहता है अथवा यूं कहें कि यह पांचों श्री कृष्ण का ही स्वरुप है ।

पहला है अर्चा विग्रह

अर्थात वह विग्रह, जो आपके घर के मंदिर में विराजमान हैं और आप उसका अर्चनं वंदनं पूजन सेवा आदि करते हैं । वह कोई शो पीस नहीं । सदा ये भाव रहे कि कृष्ण यहाँ विराजमान होकर हमारी सेवा स्वीकार कर रहे हैं ।

दूसरा है संत सदगुरु

विशेषकर सद्गुरु । सद्गुरु वह होते हैं जो शिष्य को सिर पर हाथ रखकर आत्मसात कर लेते हैं अर्थात शिष्य की भजन क्रिया आदि से प्रसन्न होकर शिष्य के प्रति उनमें आत्मीयता हो जाती है । वह सद्गुरु होते हैं । अन्यथा गुरु होते हैं ।

तीसरा है नाम

श्रीहरिनाम, श्री कृष्ण नाम, श्री राम नाम। भगवान का नाम भी साक्षात श्रीकृष्ण ही है । साक्षात भगवान ही है । नाम में भी सदा श्री कृष्ण का आविर्भाव रहता ही है अपितु नाम को कृष्ण से भी बड़ा कहा गया है ।

चौथा है धाम

कृष्ण के लिए श्री वृंदावन धाम । राम के लिए श्री अयोध्या धाम । धाम भी श्री कृष्ण का ही स्वरुप है । इसलिए शास्त्र कहते हैं कि यदि धाम वास प्राप्त हो गया तो समझो श्रीकृष्ण मिल गए ।

धाम में भी कृष्ण का आविर्भाव है । धाम भी साक्षात श्री कृष्ण का ही स्वरुप है । यदि धाम को छोड़कर हम बार बार भाग रहे हैं तो धाम प्राप्त होने पर भी भागना इससे बड़ी कृष्ण उपेक्षा नही हो सकती ।

पांचवां है श्रीमद्भागवत ग्रंथ रत्न

श्रीमद्भागवत ग्रंथ रत्न में उपरोक्त चारों के विषय में चर्चा की गई है । अर्चा विग्रह, संत सद्गुरु, नाम, और धाम । इसीलिए श्रीमद्भागवत ग्रंथ रत्न में भी सदैव श्रीकृष्ण का आविर्भाव रहता है  ।

यहां मैं कहता चलूँ श्रीमदभगवदगीता में कृष्ण का आविर्भाव शास्त्र में नहीं कहा गया है । क्योंकि उसमें इन चारों की चर्चा नहीं है  ।

जितने भी ग्रन्थ है वह प्रभु के श्री विग्रह ही है  लेकिन श्रीमद् भागवत साक्षात श्रीकृष्ण ही है अतः जब भी हम इन पांचों का सेवन करें तब मन में यह दृढ़ विश्वास रहे कि हम श्रीकृष्ण का सेवन कर रहे हैं ।

समस्त वैष्णवजन को दासाभास का  प्रणाम
जय श्री राधे जय निताई