Thursday, 10 August 2017

Shri Krishan Avtaar

Shri Krishan Avtaar

​ ✔  *श्री कृष्ण अवतार?    ✔

▶ श्रीमद्भागवत में कहा गया है
कृष्णस्तु भगवान स्वयं

▶ श्रीकृष्ण ही स्वयं भगवान है । सृष्टि के नियंता हैं। सर्वोपरि शक्ति हैं । अपितु शक्तिमान हैं । परात्पर ब्रम्ह है । सब कारणों के कारण है । और साथ में हमारे आपके इष्ट हैं ।

▶ मदभक्तानाम विनोदार्थं
करोमि विविधा क्रिया

▶ वैष्णव भक्त जनों को आनंद देने के लिए वह विविध प्रकार की लीलाएं करते हैं । उन लीलाओं के संपादन हेतु वह विविध अवतार भी लेते हैं ।

▶ अपने ऊपर के लोक से पृथ्वी लोक पर नीचे  उतरने का भाव ही अवतार है । उन अवतारों में कैसी आनंददायक लीलाएं करते हैं जिनका गुणगान और स्मरण करते हुए हम साधक लोग उनसे सदैव जुड़े रहते हैं और उनके चरणों की सेवा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं ।

▶ अनेक अवतारों में दो महत्वपूर्ण अवतार है जो हमारे आपके इर्द-गिर्द तो रहते हैं, लेकिन हम उन्हें अवतार की तरह ट्रीट नहीं करते हैं ।

▶ उन दो अवतारों में पहला है अर्चा अवतार ।

▶ अर्थात् वह श्रीविग्रह । जो हमारे घर में विराजमान है, जिसकी हम अर्चना करते हैं । उसे हम विगृह ही मानते हैं । उसमें हमारी यह भावना यदि हो जाए कि साक्षात् श्री कृष्ण अवतार लेकर हमारे घर में विराजमान होकर हमारी सेवा पूजा स्वीकार करके हम पर कृपा करने को यहां विराजमान हैं । यदि यह भावना सिद्ध हो जाए फिर हम यह नहीं पूछेंगे । भइया जी !  हमें कृष्ण के दर्शन कब होंगे । नहीं होंगे क्या ।

▶ अरे भाई कृष्ण के दर्शन तो हम रोज ही करते हैं कृष्ण तो हमारे घर में ही तो विराजमान हैं । फिर कृष्ण दर्शन कब होंगे का प्रश्न समाप्त होना चाहिए ।

▶ दूसरे जो मुख्य अवतार हैं । जो हमारे इर्द-गिर्द हमेशा ही रहते हैं ,  वह है

▶ "नाम रूपे कलि काले कृष्ण अवतार"

▶ यह कृष्ण नाम भी कृष्ण का अवतार ही है जो 24 घंटे हमारी जिव्ह्आ पर नृत्य करता रहता है

▶ कृष्ण नाम को भी कृष्ण का एक अवतार शास्त्र में माना गया है । और कृष्ण नाम के इस अवतार का आसन हमारी जिह्वा पर है ।

▶ वह सिंघासन पर नहीं विराजता । वह भोजन नहीं मांगता । वह शृंगार नहीं मांगता । वह केवल हमारी जिव्या पर नाचना चाहता है ।

▶ यदि यह भाव दृढ़ हो जाए और जब हम नाम प्रारम्भ करें तो कृष्ण से कहे कि "कृष्ण ! अब तुम नाम रूप में आओ और मेरी जिहवा पर नृत्य करो । तो फिर बाकी क्या रह जाएगा ।

▶ हम नाम कर तो रहे हैं । लेकिन आज से विग्रह और श्री नाम में साक्षात श्री कृष्ण की उपस्थिति हमें यदि होने लग जाए तो फिर इसके बाद कुछ पाने को शेष नहीं रहेगा ।

▶ समस्त वैष्णवजन के श्री चरणों में मेरा  प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Sunday, 6 August 2017

Dasabhas Lekhni Part 2

Dasabhas Lekhni Part 2


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       दासाभास लेखनी
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💎 भाग 2⃣

1⃣ निकुंज में प्रियाप्रियतम द्वारा प्रतिदिन होली लीला खेली जाती है होली नित्य है.

2⃣ दुर्वासा ऋषि ने श्रीराधा जू को वरदान दिया था कि तुम अपने हाथ से जो भी भोज्य पदार्थ बनाऔगी उसमें अमृत का अंश आ जायेगा। उस भोजन को करने वाला अतुलित बलशाली हष्ट पुष्ट रहेगा और समस्त रोगों से बचा रहेगा। इसलिए यशोदा की प्रार्थना पर कीर्ति मैया श्रीराधा जू को यशोदा जी के घर प्रतिदिन भेजती हैं और प्रिया जू यशोदा की रसोई में रन्धन करती हैं और यही पदार्थ श्रीकृष्ण रोज आरोगते हैं। प्रतिदिन रसोई बनाकर प्रिया जू वापिस बरसाना आ जाती हैं।

Suksham Sutra Part 49



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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर

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🔮 भाग 4⃣9⃣

💡 एक एम.बी.ए. का शिक्षक छात्रों को पढ़ाता है, पास करके काॅलेज से विदा करता है, जाऔ बेटा धन कमाऔ और स्वधर्म का पालन करो, एम.बी.ए. पढ़कर अनेको छात्र डी.एम,  सी.एम., कंपनी के चेयरमैन और अन्य शीर्ष स्थानो पर पहुँच जाते हैं, परंतु शिक्षक वहीं का वहीं, क्या इससे शिक्षक का महत्व या सम्मान कम हो जाता है? बिल्कुल नहीं. चाहे कितना भी बड़ा अफसर क्यों न बन जाए शिष्य तो शिष्य ही रहेगा. अपने गुरु का सम्मान करेगा ही, ऐसे ही अध्यात्म-गुरु को चाहिए कि शिष्य को ज्ञान देकर भगवद् भक्ति का मार्ग दिखाये और विदा करे. शिष्य से अपना प्रचार न करवाता रह जाये.

💡 श्रीमद्भागवत 8.19.43 में कहा गया है स्त्रियों को प्रसन्न करने के लिए, हास परिहास में, विवाह योग्य कन्या की प्रशंसा करते समय , अपनी जीविका की रक्षा के लिए, प्राण रक्षा के लिए, गौ और ब्राह्मण के हित के लिए तथा किसी को मृत्यु से बचाने के लिए असत्य भाषण उतना निन्दनीय नहीं है.

💡 शास्त्र कल्पतरु हैं : जो बात सिद्ध करना चाहो एक सीमा तक की जा सकती है. अकेले श्रीगीताजी में ही ऐसे दृष्टान्त हैं जिनसे आप ईश्वर को निराकार और साकार दोनों ही सिद्ध कर सकते हैं. इसलिए ये आवश्यक है कि उस विषय का सम्पूर्ण विवेचन हो. विशेषकर इस बात का कि कौन सी बात - कब कही गयी ? किस परिप्रेक्ष्य में कही गयी ? किससे कही गयी ? और क्यों कही गयी ?

🐚 ।। जय श्री राधे ।। 🐚
🐚 ।। जय निताई ।। 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Svatantrata

Svatantrata

स्वतंत्रता 🚩🚩🚩🚩🚩

🚩स्व माने अपना । तंत्र माने शासन ।
अर्थात अपने ऊपर अपना शासन । जेसे आज 15 अगस्त के दिन भारत से अंग्रेजों का शासन हट कर अपना अर्थात भारतीयों का शासन प्रारम्भ हुआ ।

🚩हमारे भगवान श्री कृष्ण सर्वतंत्र स्वतंत्र हैं । अर्थात उनके ऊपर किसी का भी किसी प्रकार का शासन नहीं है ।

🚩अपितु अपने ऊपर उनका अपना ही शासन है वह जो चाहते हैं कर सकते हैं । यहां तक कि वह कान से खा सकते हैं और मुख  से सुन सकते हैं । उनके ऊपर कोई भी बंधन, नियम, सीमा नहीं है वे परम स्वतंत्र हैं ।

🚩हम जीव उन्ही का ही अंश है । हम परम स्वतंत्र नहीं है । हम अणु स्वतंत्र हैं ।

🚩कुछ ऐसा समझें कि वे अनलिमिटेड स्वतंत्र हैं और हमलोग लिमिटेड स्वतंत्र हैं । हम स्वतंत्र अवश्य हैं ।

🚩यदि हम स्वतंत्र नहीं होते तो हमें कुछ आदेश पालन करने के लिए और कुछ आदेश न करने के लिए नहीं दी जाते ।

🚩जैसे कि पशु । पक्षिओं के पालन करने के लिए पशुओं को कोई आज्ञा नहीं दी जाती ।

Thursday, 3 August 2017

Bhakti Kya Hai

Bhakti Kya Hai

​ ✔  *भक्ति क्या है*    ✔

▶ भगवान श्रीकृष्ण में वैसे तो अनंत शक्तियां हैं, लेकिन उनकी समस्त शक्तियां इन तीन शक्तियों के अंतर्गत है ।

▶ पहली है आह्लादिनी शक्ति अर्थात श्री राधाजु, अर्थात आनंद देने वाली शक्ति ।

▶ भगवान का स्वरूप सच्चिदानंद है । उसमें सत चित और आनंद इन तीन शक्तियों में से आह्लादिनी शक्ति आनंद का अंश है ।

Dasabhas Lekhni Part 1

 दासाभास लेखनी

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        दासाभास लेखनी
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💎 भाग 1⃣

1⃣ रुचि एवं आसक्ति का अंतर -   रुचि भजन में होती है और आसक्ति कृष्ण में .

2⃣ रोना सीखना है प्रभु के लिए - कथा गाना नहीं सिखाती रोना सिखाती है, कबिरा हसना बन्द कर रोने से कर प्रीत .

3⃣ प्राय सभी स्तव स्तोत्रों में फल श्रुति होती है कि इसके पाठ से पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन फिर भी व्यक्ति कष्ट क्यों भोगता है। इसमें भाव ये है कि हमारे अनन्तानन्त पाप हैं। अवश्य ही पाठ-स्तव आदि से कुछ हमारे पाप कट ही जाते हैं फिर भी कुछ रह जाते हैं, हमें उन्हें भोगना पड़ता है. पाठ आदि न करें तो इतने पाप हो जाय, भोगने पड़े कि हद हो जाय।

🔔 ।। जय श्री राधे ।। 🔔
🔔 ।। जय निताई  ।। 🔔

🖋 लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

Tuesday, 1 August 2017

Aar Ya Par


​ ✔  *आर या पार*    ✔

▶ एक तो यह आर पार वाली शैली होती है । और दूसरी शैली होती है संतुलन ।

▶ कहीं-कहीं हमें आर या पार वाली शैली को अपनाना पड़ता है और कहीं कहीं संतुलन वाली शैली को अपनाना पड़ता है ।

▶ लेकिन हम लोग संतुलन वाली जगह आर या पार कर देते हैं और आर या पार वाली जगह संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं ।

▶ घर हो ग्रहस्थ हो और भजन हो इन दोनों में संतुलन बनाना है । अपने सांसारिक परिस्थिति के अनुसार संसार का समय और भजन के समय को निश्चित करना है ।

▶ दासाभास जैसा संसार के दायित्वों से मुक्त व्यक्ति को भजन में अधिक समय देना है । संसार में कम समय देना है ।

▶ अभी सांसारिक दायित्व जिन पर हैं उन्हें संसार में अधिक समय देना है, भजन में कम समय देना है । धीरे धीरे बढाना है ।

▶ ऐसे ही सोशल मीडिया पर हमें एक सीमा में समय देना चाहिए । यदि हम अति करते हैं और दिनभर सोशल मीडिया पर लगे रहते हैं ।

▶ तो ऐसा लंबे समय तक नहीं चलता है । एक दिन ऐसा आता है कि हम एकदम छोड़ देते हैं । यहां भी संतुलन बैठाने की जरूरत है ।

▶ सारी परिस्थितियों को देखते हुए सोशल मीडिया पर यदि हम संतुलन से समय देंगे तो हमें ना तो इसमें डूबने की जरूरत पड़ेगी और ना इस से भागने की जरुरत पड़ेगी यहां संतुलन बहुत आवश्यक है ।

▶ और यदि कुछ अन्य व्यस्तताएं हैं तो सोशल मीडिया को एक-दो दिन के लिए इग्नोर भी किया जा सकता है और कम समय देकर इसका आनंद भी लिया जा सकता है ।

▶ अतिवादिता कहीं भी अच्छी नहीं । गीता में भी कहा गया है कि

▶ ना अधिक खाने वाला और
ना अधिक भूखा रहने वाला
ना आलसी और
न अधिक परिश्रमी  ।

▶ अपितु जो संयत है वही लक्ष्य या भगवद्भक्ति को प्राप्त कर सकता है ।

▶ अतिवादी कभी भी किसी भी उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकता है । यदि कदाचित वह कर भी लेता है तो उसकी जो उसको कीमत चुकानी पड़ती है आंख खुलने पर बड़ा पछताता है ।

▶ इसलिए हम चेक करें जहां भी हम अतिवादी हैं उसको कम करें और संसार से, भजन से, सोशल मीडिया से, मित्रों से लंबी लंबी बात करने से अथवा जो भी हो हम अपने बारे में स्वयं जानते हैं । उसमे सन्तुलन लाएं ।

▶ केवल दूसरा व्यक्ति या दासाभास आप को इंगित कर सकता है । आप स्वयं अपने आप को चेक करें और जहां भी

▶ अतिवादिता है या अभाव है
उसको दूर करें ।
संतुलित रहें । मस्त रहें

▶ समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn