Showing posts with label मदीयता भाव. Show all posts
Showing posts with label मदीयता भाव. Show all posts
Tuesday, 29 November 2016
Wednesday, 20 July 2016
दो प्रकार के भाव होते हैं
✅ *दो प्रकार के भाव होते हैं* ✅
▶ एक ऐसा भाव होता है जिसको *तदीयता भाव* बोलते हैं अर्थात मैं *तुम्हारा* हूं अर्थात तुम्हारे *शरणागत* हूं
▶ अब तुम मुझे सुख दो । दुख दो। मारो । रक्षा करो । मेरा ध्यान रखो। रखो ना रखो । मारो । बचाओ । जो भी करना है आपने करना है
▶ हे प्रभु मैं तो बस आपके पास आ गया। मैं अब तुम्हारा बन गया । मैं अब संसार का नहीं हूं । यह भाव भी बहुत श्रेष्ठ है । लेकिन इससे और भी श्रेष्ठ भाव है *मदीयता का भाव*
▶ मदीयता भाव मैं । हे प्रभु अब तुम मेरे हो। मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगा । तुम्हारे सुख की चिंता करुंगा । तुम्हारी सेवा करूंगा । तुम्हें यथासंभव प्रसन्न रखूंगा ।
▶ इस भाव में अपने बारे में कोई सोच ही नहीं है कि तुम मेरा ध्यान रखना या मुझे दुखी करना या सुखी करना । हित करना । यह सब नहीं है
▶ *तदीयता भाव* में ठीक है प्रभु के प्रति समर्पण तो है लेकिन कहीं ना कहीं अपनी सारी जिम्मेदारियां प्रभु पर थोप देने का भाव है ।
▶ केंद्र अपने ऊपर है और सेकेंडरी है प्रभु की सेवा लेकिन *मदीयता भाव* में प्रभु की सेवा ही केंद्र में है ।
▶ अपने बारे में कोई चिंता नहीं है प्रभु का ही सब प्रकार से सुख विधान करना मदीयता भाव का मूल उद्देश्य है
▶ अब जब ऐसा कोई भाव रख लेता है तो फिर प्रभु ने स्वयं कहा है *अनन्याश्चिंतयंतो मां ये जना* *पर्युपासते* जो अनन्य भाव से मेरा भजन करते हैं मैं उनकी सब प्रकार से योगक्षेम वहन करता हूं
▶ इस प्रकार *मदीयता में तदीयता* तो अपने आप ही आ जाती है लेकिन यदि शुरुआत तदीयता से भी हो तो साधक तदीयता के बाद मदीयता में आ ही जाता है
▶ क्योंकि यह श्रेष्ठ है इसमें जीवो के दास्य स्वरूप का सही दर्शन है और कृष्ण चरण सेवा । कृष्ण सुख प्राप्ति की ही आशा है
🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚
🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn
▶ एक ऐसा भाव होता है जिसको *तदीयता भाव* बोलते हैं अर्थात मैं *तुम्हारा* हूं अर्थात तुम्हारे *शरणागत* हूं
▶ अब तुम मुझे सुख दो । दुख दो। मारो । रक्षा करो । मेरा ध्यान रखो। रखो ना रखो । मारो । बचाओ । जो भी करना है आपने करना है
▶ हे प्रभु मैं तो बस आपके पास आ गया। मैं अब तुम्हारा बन गया । मैं अब संसार का नहीं हूं । यह भाव भी बहुत श्रेष्ठ है । लेकिन इससे और भी श्रेष्ठ भाव है *मदीयता का भाव*
▶ मदीयता भाव मैं । हे प्रभु अब तुम मेरे हो। मैं तुम्हारा ध्यान रखूंगा । तुम्हारे सुख की चिंता करुंगा । तुम्हारी सेवा करूंगा । तुम्हें यथासंभव प्रसन्न रखूंगा ।
▶ इस भाव में अपने बारे में कोई सोच ही नहीं है कि तुम मेरा ध्यान रखना या मुझे दुखी करना या सुखी करना । हित करना । यह सब नहीं है
▶ *तदीयता भाव* में ठीक है प्रभु के प्रति समर्पण तो है लेकिन कहीं ना कहीं अपनी सारी जिम्मेदारियां प्रभु पर थोप देने का भाव है ।
▶ केंद्र अपने ऊपर है और सेकेंडरी है प्रभु की सेवा लेकिन *मदीयता भाव* में प्रभु की सेवा ही केंद्र में है ।
▶ अपने बारे में कोई चिंता नहीं है प्रभु का ही सब प्रकार से सुख विधान करना मदीयता भाव का मूल उद्देश्य है
▶ अब जब ऐसा कोई भाव रख लेता है तो फिर प्रभु ने स्वयं कहा है *अनन्याश्चिंतयंतो मां ये जना* *पर्युपासते* जो अनन्य भाव से मेरा भजन करते हैं मैं उनकी सब प्रकार से योगक्षेम वहन करता हूं
▶ इस प्रकार *मदीयता में तदीयता* तो अपने आप ही आ जाती है लेकिन यदि शुरुआत तदीयता से भी हो तो साधक तदीयता के बाद मदीयता में आ ही जाता है
▶ क्योंकि यह श्रेष्ठ है इसमें जीवो के दास्य स्वरूप का सही दर्शन है और कृष्ण चरण सेवा । कृष्ण सुख प्राप्ति की ही आशा है
🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚
🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn
Subscribe to:
Posts (Atom)

