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Friday, 8 September 2017

Char Prkar ke Vakta


✔ *चार प्रकार के वक्ता* ✔

1⃣ पहले प्रकार के वक्ता वो होते हैं जो कहीं कथा सुनकर या चलते-फिरते टी वी आदि में सुनकर उसको याद कर लेते हैं और श्रोताओं को सुना देते हैं ।

➡ उस विषय का उन्हें ज्ञान नहीं होता है । कोई तर्क करें या पूछें तो वह कुछ बता नहीं पाते हैं या उलटा सीधा बताते हैं ।

2⃣ दूसरे प्रकार के वक्ता हैं जो श्रवण तो करते ही हैं, सुनते  हैं, साथ ही उस विषय का अध्ययन भी करते हैं ।

ग्रंथों में पढ़ते हैं और समझते हैं । सुन कर, समझ कर फिर श्रोताओं को बताते हैं ।

3⃣ तीसरे प्रकार के वक्ता हैं जो पहले तो श्रवण करते हैं, सुनते हैं । फिर ग्रंथों में पढ़ते हैं उसको समझते हैं । उसके बाद स्वयं उस विषय में आचरण करते हैं । आचरण करके फिर श्रोताओं को बताते हैं ।

➡ जो आचरण करने वाले वक्ता होते हैं, वास्तव में वही आचार्य हैं । न कि परंपरा से उत्पन्न हुए या आचार्य का पुत्र आचार्य । ऐसा कदापि नहीं है ।

➡ इनको महत्तर वक्ता कहा गया है । इनके द्वारा इनके श्री मुख से कथा श्रवण करने पर हृदय में थोड़ा-बहुत प्रभाव पड़ता है ।

4⃣ इस से भी ऊपर एक प्रकार के वक्ता होते हैं जो श्रवण भी करते हैं, ग्रंथों में अध्ययन भी करते हैं, उसका आचरण भी करते हैं । और मन वचन कर्म से इस प्रकार आचरण करते हैं कि जो वह कहते हैं उन्हें उसका अनुभव हो जाता है ।

➡ और वह ताल ठोक कर , कॉन्फिडेंस से किसी बात को कहते हैं । क्योंकि उन्हें उस बात का पक्का पक्का अनुभव होता है,  जिसे हम टेक्निकल भाषा में विज्ञान बोलते हैं ।

➡  ज्ञान के साथ साथ अनुभव हो जाना विज्ञान कहलाता है । विज्ञानी वक्ता के मुख से यदि कथा श्रवण की जाए तो वह कथा हृदय में उतर जाती है ।

➡ और उसका एक एक शब्द जीव का बहुत ही शीघ्र कल्याण कर देता है । यही कारण है कि आज-कल कथाएं तो बहुत हो रही हैं, लेकिन वक्ताओं का स्तर आप स्वयं निर्णय करें कि कौन सा है ।

➡  पैसा लेकर कथा करने वाला कभी भी विज्ञानी नहीं हो सकता । कभी भी आचरण शील नहीं हो सकता । धामकी अंगणित महिमा गाने वाला धाम छोड़कर 320 दिन धाम से बाहर रहता है ।

➡ उसकी बातों का हृदय पर क्या असर होना है जप करो, जप करो, नाम करो, नाम करो,  कहने वाले के हाथ में कभी माला झोली नहीं देखी गई उसके कहने से क्या प्रभाव होगा ।

➡  इसलिए जहां भी भगवत कथा सुनने की बात कही गई है महत्तम या कम से कम महत्तर वैष्णव के मुख से कथा श्रवण करने की आज्ञा शास्त्रों ने दी है ।

➡ महत्तम तो मिलना बहुत ही कठिन है । महत्तम कथा वाचक थे श्री शुकदेव ।

➡ उन्होंने परीक्षित को कथा सुनाई और कथा के  वह दृश्य उपस्थित कर दिए और पूरी की पूरी कथा को परीक्षित को हृदयंगम करा दिया ।

➡ ना कोई भेंट मांगी । ना दक्षिण मांगी । न पंडाल बनाया । न संगीत के वादक । ढोलक थी । और वह कथा जीवन में श्री शुकदेव जी ने एक ही बार कही ।

➡ हर तीसरे दिन उनका टेक्सास में कथा नहीं होती थी । अतः चिंतन करें और सावधान रहें ।

➡ नाभि से जो निकले, ह्रदय से जो निकले, वो श्रेष्ठ कथा । नाभि या ह्रदय से भक्तों का चरित भक्तमाल लिखने वाले नाभादास हो गए । इनका पूर्व का नाम नारायण दास था

➡ समस्त वैष्णवजन को दासाभास का  प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚

🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊  लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Monday, 13 June 2016

नवविधा भक्ति


✅  नवविधा भक्ति ✅ 

▶ नवविधा भक्ति के परिचायक
जनरेटर हैं श्री प्रह्लाद

▶ श्रीमद् भागवत में सातवें अध्याय के 5 वे अध्याय में नवविधा भक्ति का वर्णन आता है इसमें

▶ श्रवण
▶ कीर्तन
▶ स्मरण
▶ पाद सेवन
▶ अर्चन
▶ वंदन
▶ दास्य
▶ सख्य और
▶ आत्मनिवेदन

का वर्णन किया गया है  । जब प्रहलाद के पिता ने प्रह्लाद से पूछा के तुम्हारी पढ़ाई कैसे चल रही है तब उन्होंने अपने पिता  हिरण्यकशिपु से कहा की यह नो प्रकार की भक्ति है इसको समझना और उसका आचरण करना ही जीवन की सर्वोत्तम पढ़ाई है । और अध्ययन का फल है ।

▶ तो पिता ने पूछा कि मेरे गुरुदेव शुक्राचार्य के पुत्र षंढ एवं अमर क्या तुम्हें यही पढ़ाते हैं तो प्रह्लाद ने कहा मैं उनकी शिक्षा को ग्रहण नहीं करता हूं

▶ क्योंकि जो भगवद विरोधी शिक्षा दें वह कैसा गुरु । मेरे गुरु तो वास्तव में श्री नारद हैं उन्होंने जो मुझे गर्भ में शिक्षा दी मैं उसी को स्मरण करता हूं और धारण करता हूं ।

▶ आप देखिए भक्ति भजन का सर्वोत्कृष्ट रहस्य एवम् मार्ग नवविधा भक्ति प्रह्लाद जी द्वारा ही श्रीमद्भागवत में प्रकट की गई है और प्रहलाद जी ने इन समस्त भक्तियों का अनुष्ठान किया । विशेषकर श्री कृष्ण के स्मरण में प्रहलाद जी ने दक्षता प्राप्त की ।

▶ इन नौ भक्तियों में

▶ श्रवण भक्ति के आचरण करता है परीक्षित

▶ कीर्तन के आचरण करता है श्री शुकदेव

▶ स्मरण के आचरण करता है श्री प्रहलाद

▶ पाद सेवन करती हैं श्रीलक्ष्मी

▶ पूजन के आचरण करता है राजा पृथु

▶ वंदन के आचरण करता है श्री अक्रुर

▶ सेवा के आचरण करता है श्री हनुमान

▶ और सख््य के आचरण करता है श्री अर्जुन

▶ एवं सर्वतोभाव से आत्म निवेदन करने वाले हैं राजा बलि

▶ यहां यह बात और स्मरणीय है कि नवविधा भक्ति के किसी भी एक अंग को यदि अनन्यता पूर्वक पकड़ लिया जाए तो कृष्ण प्रेम की प्राप्ति हो सकती है

▶ श्री प्रहलाद ने स्मरण का आश्रेय लिया और स्मरण के आश्रय से ही आज के दिन श्री नरसिंह भगवान का प्रादुर्भाव हुआ ।

▶ बोलिए नरसिंह भगवान की जय
▶ प्रह्लाद जी ने ही सर्व प्रथम नव विधा भक्ति का उद्घोष किया । कॉपी पेस्ट नही किया । 😅😀😅😀

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚

🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊  लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया  
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नवविधा भक्ति