Monday, 20 February 2017

TriSandhya

Trikaal Sandhya


✅ त्रिसंध्या ✅

▶ संध्या उस समय को कहते हैं जब एक समय जा रहा होता है और दूसरा समय आ रहा होता है ।

▶ जैसे सूर्योदय से कुछ समय पूर्व रात्रि जा रही होती है और दिन आ रहा होता है ।

▶ ऐसे ही दोपहर में जब सूर्य चढ़ते-चढ़ते उतरने लगता है लगभग 12:00 बजे का समय वह भी संध्या होती है ।दोपहर म् पूर्वान्ह । मध्यान्ह । अपराह्न । ये तीन काल होते हैं ।

▶ ठीक ऐसे ही शाम को जब दिन छुप रहा होता है और रात्रि आ रही है होती है उसको भी संध्या कहते हैं ।

▶ इस प्रकार दिन में तीन संध्या होती है
एक प्रातः वाली
एक दोपहर वाली और
एक शाम वाली

▶ संध्या का समय भजन के लिए, उपासना के लिए बहुत ही उपयुक्त माना गया है ।

▶ वैष्णव लोग त्रिकाल संध्या करते हैं ।
जैसे काल भी तीन हैं
भूत
वर्तमान और
भविष्य

▶ ऐसे ही संध्याएं भी तीन हैं । संध्या का समय शांत होता है,  नीरव होता है । जो जा रहा होता है वह भी शांत होता है और जो आ रहा होता है वह भी शांत होता है ।

▶ अतः हम वैष्णवजन को प्रयास करके त्रिकाल संध्या के समय अवश्य थोड़ा-थोड़ा भजन बन् पड़े तो करना चाहिए ।

▶ अन्यथा नाम के लिए तो कोई देश, कोई काल कोई परिस्थिति की अपेक्षा नहीं है । कभी भी, कैसे भी कर सकते हैं ।

▶ जिनका मन अधिक चंचल हो, मन न लगता हो वह प्रयास करके इन तीनों संध्याओं में यदि कुछ भजन करें  ।

▶ कुछ उपासना करें , कुछ ध्यान लगाएं , कुछ नाम करें तो उनकी चंचलता अपेक्षाकृत जल्दी ठीक हो सकती है ।

▶ संध्याओं का अपना एक महत्त्व है । उसका लाभ उठाना चाहिए ।

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Sunday, 19 February 2017

Sukshm Sutra Part 39



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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
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 🔮 भाग 3⃣9⃣

💡 इच्छा दो प्रकार की होती है-
प्राप्त वस्तु को भोगने की इच्छा और
सुनी सुनाई अप्राप्त वास्तु को
प्राप्त करने की इच्छा .
साधक को दोनों का परित्याग कर
भजन करना चाहिए अन्यथा 
मन इच्छाओं में ही रमता रहेगा
भजन नही हो पायेगा

💡 बुद्धिमान और ज्ञानवान मनुष्य
का भक्त होना कठिन है.
भक्ति के लिए तो सब कुछ का
त्याग करना आवश्यक है.
अपनी बुद्धि भी- अपना ज्ञान भी
क्रुश्नार्प्न करना पड़ेगा तभी
वह भक्त बन पायेगा.
अन्यथा इस अहंकार से ही वह
अधर में लटका रह जाएगा.

💡 जो संसाधन हमे प्राप्त है
उनसे ही अपना वर्तमान
श्रेष्ठतम बनाने का प्रयास करना है.
भविष्य के लिए अपना वर्तमान
बिगाड़ना कोई बुद्धिमानी नही है.
हर अवस्था में यदि इस मूल मन्त्र
को अपना ले तो संतोष-सुख
अवश्य प्राप्त होगा.

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Saturday, 18 February 2017

Madhurya Kadambini 6

Madhurya Kadambini 6

✴️माधुर्य कादम्बिनी कथा ✴️

भाग 6⃣

🎙  सवर: दासाभास डा गिरिराज

🏚 वृन्दावन  धाम

🙇🏼 प्रस्तुती  : अनंत हरिदास

http://yourlisten.com/Dasabhas/madhurya-6-6

Tuesday, 14 February 2017

Suksham Sutra Part 38

Suksham Sutra Part 38


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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺

 🔮 भाग 3⃣8⃣

💡 निंद्रा का त्याग और जागना दोनों
एक ही क्षण होता है.
ऐसे ही सांसारिक विषयों का त्याग
और भगवान् की ओर सन्मुखता
एक ही क्षण में होगी. इसलिए
ये सोचना मुर्खता है कि अभी संसार से
मन हटा रहे है फिर भगवान् में लगायेंगे.

💡 कड़वा किन्तु सत्य
जीवन भर प्रवचन सुनते रहना
मोटे मोटे ग्रंथो का स्वाध्याय करना
गुरुचरणों में बैठकर
अनेक ज्ञान की बातें सीखते रहना
ऐसे ही है जैसे जीवन भर एम बी ए की क्लास में
बैठे रहना पर नौकरी के लिए किसी कम्पनी को
ज्वाइन न करना. इसलिए आज ही
भजन करो -भजन.
सुनते ही रहोगे-आचरण में कब लाओगे
   
💡 जाने या अनजाने में भी
यदि किसी वैष्णव के प्रति
अपराध बन जाये तो
सविनय उन्ही के
चरणों में ही जाकर उनसे
क्षमायाचना करनी चाहिए
क्योंकि अपने भक्त के प्रति
किये गये किसी अपराध को
स्वयं प्रभु भी क्षमा नही करते

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Monday, 13 February 2017

Panchdev Aur Bhagwan

Panchdev Aur Bhagwan


✔  *पंचदेव और भगवान*    ✔

▶ सृष्टि में 5 देवों की उपासना प्रचलित है ।

▶ विष्णु
▶ शिव
▶ देवी
▶ सूर्य
▶ गणेश

▶ वैसे तो सभी की उपासना सब करते ही हैं, लेकिन जो लोग गणेश को सर्वोपरि सत्ता मानते हैं वह गाणपत्य कहलाते हैं ।

▶ जो सूर्य को सर्वोपरि सत्ता मानते हैं वह सौर कहलाते हैं ।

▶ जो देवी को सर्वोपरि सत्ता मानते हैं वे शाक्त कहलाते हैं ।

▶ जो शिव को सर्वोपरि सत्ता मानते हैं वह शैव कहलाते हैं और जो

▶ विष्णु को सर्वोपरि सत्ता मानते हैं वह वैष्णव कहलाते हैं ।

▶ विष्णु आदि यह सभी पांच "देव" हैं और यह सभी किसी न किसी प्रकार से भगवान श्री कृष्ण के अंश ही है या आवेश है या शक्तियां हैं या अंश के अंश है । इनमें से कोई भी भगवान नहीं है ।

▶ इसीलिए पंचदेवोपासना कही गई है "पंच भगवान उपासना" नहीं कही गई है । देव अनेक होते हैं । भगवान एक ही होता है ।

▶ श्रीमद भागवत में इन सब का वर्णन करते हुए स्पष्ट कहा है "एते चांश कला पुंसः कृष्णस्तु भगवान स्वयं" । कृष्ण साक्षात भगवान हैं ।

▶ इन् देवों की पूजा करना कोई मना नहीं है लेकिन यदि इनको सर्वोपरि सत्ता या ईश्वर या भगवान मानकर पूजा किया जाए तो श्री कृष्ण के प्रति यह उपेक्षा एवं अपराध है ।

▶ कृष्ण के दास, कृष्ण के सेवक, कृष्ण के अनुचर मान के इनकी पूजा प्रणाम में कोई हानि नहीं है अपितु ऐसा करने से यह देवी देवता भी साधक को कृष्ण प्रेम पथ प्रदान करते हैं । कृष्णा सेवा प्रदान करते हैं । कृष्ण की ओर मोड़ देते हैं ।

▶ भगवान श्री कृष्ण के प्रकाश हैं बलराम । बलराम के अंश है महा विष्णु । महा विष्णु के फिर अंश के अंश है यह ब्रम्हा विष्णु महेश । विष्णु शब्द एक तो इन विष्णु का वाचक है ।

▶ दूसरा विष्णु शब्द का अर्थ होता है विभु जो सर्वत्र व्याप्त है । अथवा विष्णु शब्द का अर्थ इष्ट भी है । जहां लिखा गया इसके पश्चात विष्णु की पूजा करें अर्थात अपने इष्ट की पूजा करें ।

▶ भगवत स्वरुप इष्ट वह कृष्ण, राम, वामन, नरसिंह जो स्वयं भगवत स्वरुप हैं । उनकी पूजा करें यह भाव है ।

▶ विष्णु का अर्थ इष्ट है और वेदों में अथवा पुराणों में विष्णु तक का ही वर्णन है । विष्णु के जो मूल तत्व है श्रीकृष्ण उनका वर्णन विशेष रूप से श्री मदभागवत में हुआ है ।

▶ इसलिए जो श्रीमद्भागवत के परिचय में है वह श्रीकृष्ण को अच्छी तरह जानते हैं और जो कर्मकांडी लोग पुराण आदि के टच में रहते हैं वह विष्णुस्वरूप तक ही पहुंच पाते हैं ।

▶ उसके ऊपर जो उनका मूल तत्व श्री कृष्ण है जो स्वयं भगवान है वहां तक उनकी गति नहीं जा पाती है । इसीलिए हम वैष्णव जन को अपने इष्ट के प्रति समर्पित हमें सदा श्री कृष्ण का ही पूजन उपासना करनी चाहिए ।

▶ श्रीराम से भी श्री कृष्ण में चार माधुर्य अधिक है । श्रीकृष्ण ही मूल तत्व है । परात्पर तत्व हैं । सर्वोपरि सत्ता है । परम ब्रह्म है । परात्पर ब्रहम है । इस बात को सदैव समझे रहना चाहिए ।

🙇🏼समस्त वैष्णव जन को दासाभास का  प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Thursday, 9 February 2017

Shri Nityanand Tryodashi

Shri Nityanand Tryodashi


✔️  *श्री नित्यानंद त्रयोदशी​​​​*    ✔️

▶️ गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के अनेक आचार्यों में से एक श्रील नरोत्तम दास ठाकुर भगवान की स्तुति में लिखते हैं कि जब कोई भगवान श्री नित्यानंद प्रभु के चरणकमलों का आश्रय लेता है तो उसे सहस्त्र चंद्रमाओं की शीतलता का आभास होता है । यदि कोई वास्तव में राधा-कृष्ण की नृत्य-मंडली में प्रवेश करना चाहता है तो उसे दृढ़ता से उनके(नित्यानंद प्रभु के) चरण-कमलों को पकड़ लेना चाहिए ।
कलियुग में भगवान श्री कृष्ण इस भौतिक जगत में श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित होते हैं और उनके साथ बलराम जी, श्री नित्यानंद प्रभु के रूप में आते हैं । भगवान नित्यानंद, निताई, नित्यानंद प्रभु और नित्यानंद राम के नाम से भी पुकारे जाते हैं । उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रधान पार्षद की भूमिका में भगवान श्री कृष्ण के पवित्र-नाम को हरिनाम-संकीर्तन द्वारा प्रचार करने का उत्तरदायित्व उठाया था ।

▶️ उन्होंने सामूहिक रूप से भगवान के पवित्र-नाम का कीर्तन करके भौतिक जगत के पतित एवं बद्ध जीवों के मध्य भगवान श्री कृष्ण की कृपा को वितरित किया । हमारे पूर्वाचार्यों की शिक्षाओं के अनुसार ब्रह्माण्ड के आदि (मूल) गुरु, श्री नित्यानद प्रभु का आश्रय लिए बिना श्री चैतन्य महाप्रभु तक पहुँचना या उन्हें समझना असंभव है । वे श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तों के बीच एक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं । वे भगवान का प्रथम विस्तार हैं, जो श्री कृष्ण के संग बलराम, श्री राम के संग लक्ष्मण एवं श्री चैतन्य महाप्रभु के सं नित्यानंद प्रभु के रूप में प्रकट होते हैं ।

▶️ वे भगवान कृष्ण की सेवा के लिए पांच अन्य रूप लेते हैं । वे स्वयं भगवान कृष्ण की लीलाओं में सहायता करते हैं तथा वासुदेव, संकर्षण, अनिरुद्ध और प्रद्युम्न के चतुर्व्यूह रूप में सृष्टि के सृजन में सहायता करते हैं । वे अनंत-शेष के रूप में भगवान की अन्य कई सेवाएं करते हैं । हर रूप में वे भगवान कृष्ण की सेवा का दिव्य-आनंद का अनुभव करते हैं ।

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊  लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindan

Tuesday, 7 February 2017

Madhurya Kadmbini Part 4



✴️माधुर्य कादम्बिनी कथा ✴️

भाग 4⃣

🎙  स्वर: दासाभास डा गिरिराज

🏚वृन्दावन धाम

🙇🏼 प्रस्तुति : अनंत हरिदास

http://yourlisten.com/Dasabhas/madhurya4-4#