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Friday, 1 September 2017

Guru Parampara Anugatya


✔ *गुरु परंपरा आनुगत्य* ✔

➡ वैष्णव उपासना, विशेषकर गौड़ीय वैष्णव उपासना में आनुगत्य का बहुत अधिक महत्व है । बिना किसी परंपरा के, बिना किसी परंपरा के अंतर्गत संत स्वरूप किसी को गुरुदेव को धारण किए बिना आनुगत्य प्राप्त नहीं होता है ।

➡ और आनुगत्य प्राप्त ना होने पर भजन का मार्ग प्रशस्त नहीं होता है ।

➡ विभिन्न प्रकार की उपासनाएँ हैं । विभिन्न संप्रदाय हैं, अनेक उपास्य हैं, साधक को उसमें से एक परंपरा एक उपासना, एक साधन को चुनना पड़ता है ।

➡ ठीक वैसे, जैसे एक विद्यार्थी को यह चुनना पड़ता है कि वह कॉमर्स में इंटर करेगा, साइंस में करेगा, आर्ट्स में करेगा, मैनेजमेंट में करेगा या किसी अन्य में करेगा ।

 ➡ जब एक साधक गुरु धारण करके किसी एक गुरु परंपरा से जुड़ जाता है तब उस को सम्मान तो सभी का करना है । जीव मात्र का करना है ।

➡ अपमान और आलोचना तो वैष्णव को करनी ही नहीं है लेकिन अपनी निष्ठा । अपना अपना साधन, अपना मंत्र अपना नाम, अपना भजन, अपनी परंपरा के अनुसार करना होता है ।

➡ हम जिस परंपरा में हैं । हमारे गुरुदेव का जो आदेश है वह हम पालन करेंगे । दूसरा जिस परंपरा में है उसकी गुरु परंपरा या गुरुदेव का जो आदेश है वह उसका पालन करेगा ।

➡ यदि यह बात सहजता से मस्तिष्क में बैठ जाए तो कभी भी यह प्रश्न नहीं उठता कि फला व्यक्ति यह बात क्यों बोलता है ।

➡ इस्कॉन वाले सभी हरे कृष्ण बोलते हैं, बृजवासी सभी जय श्री राधे बोलते हैं, कुछ जय निताई बोलते हैं, कुछ जय श्री कृष्ण बोलते हैं । कुछ जय श्री राम बोलते हैं ।

➡ यह सहज ही है । ऐसा होना ही चाहिए । यह उनकी गुरु परंपरा का आदेश है ।

➡ इसी प्रकार तिलक भी अनेको प्रकार के हैं । गुरु परंपरा से जो तिलक प्राप्त हुआ है, उसे वही लगाना है और मुझे वही लगाना है जो मेरी गुरु परंपरा से मुझे प्राप्त है ।

➡ अब एक प्रश्न आता है कि जो गुरु परंपरा से बंधे नहीं है वह निगुरे है । वह या तो तिलक लगाते नहीं है । या उन्हें जो समझ में आ गया जो अच्छा लगा वह लगा लेते हैं ।

 ➡ और ऐसे ही कुछ लोग दूसरे की उपासना भजन और नाम आदि की आलोचना करते हैं । उनको लगभग ऐसा माना जाए कि उन्होंने इंटर में अभी प्रवेश ही नहीं लिया है कम पढ़े लिखे लोग हैं ।

➡ वही कहते हैं कि अरे यह तो साइंस की बात करता है । यह कॉमरस की बात करता है ।यह आर्ट की बात करता है  । अज्ञान के कारण इस प्रकार की बात होती है ।

➡ अतः जो भी जो कुछ कर रहा है, वह यदि अपनी परंपरा से कर रहा है तो ठीक ही है । हम भी अपनी परंपरा के अनुसार अपना साधन भजन नाम करें और यदि हम अभी किसी गुरु परंपरा से नहीं जुड़े हैं तो प्रयास करें कि हम जुड़े ।

➡ यदि नहीं जुड़ना चाहते तो कम से कम हम यह समझे कि जो भी जो कर रहा है, अपने गुरुदेव, गुरु परंपरा के आदेश से कर रहा है ।

➡ गुरु परंपरा का आदेश का पालन करना ही आनुगत्य कहलाता है । आनुगत्य के बिना श्री कृष्ण प्रेम या भजन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता है ।

➡ समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Tuesday, 17 January 2017

Bhagawan Ki Kripa ke Teen Dwar


Bhagawan Ki Kripa ke Teen Dwar
भगवान की कृपा के तीन द्वार

भगवान की कृपा के तीन द्वार

1⃣ शास्त्र
शास्त्र या ग्रन्थ वे हैं जो या तो अपौरुषेय हैं या जो विज्ञानी अर्थात् अनुभवी संत । आचार्यों द्वारा लिखे गए हैं ।

धनवान सेठों या नाटकीय लोगों द्वारा अपने यश हेतु ऊल जुलूल लिखे गए ग्रन्थ शास्त्र नही हैं ।

शास्त्रों के अध्ययन से दासाभास सहित सबको भगवान का ज्ञान होता है । भजन करने की आवश्यकता और विधि एवं रहस्यों का ज्ञान होता है ।

इसके बाद । भगवान की महिमा का । अपने दुर्लभ मानव जीवन का ज्ञान होने पर ही मानव भजन म् प्रवृत्त होता है । अतः सबसे पहले शास्त्र कृपा ।

2⃣ गरु
अथवा संत वैष्णव द्वारा भी हमे कृपा की प्राप्ति होती है । इनकी सेवा, इनकी आज्ञा पालन से ये हमे भजन का मार्ग बताते हैं । क्योंकि इन्होंने वह मार्ग देखा होता है, इन्हें अनुभव होता है ।

विशेष कर सच्चे संत निरपेक्ष होते हैं, करुणा शील होते हैं । वे चाहते हैं कि जो आनंद मुझे मिल रहा है वह इसे भी मिले ।

अतः व्यावसायिक गुरु या कथावाचक जो अपनी गृहस्थी चलाने के लिए अध्यात्म में आये हों, उनसे बचते हुए सच्चे सन्तों का संग अवश्य करना चाहिए । यूंकि कृपा अवश्य प्राप्त करनी ही है दासाभास को ।

3⃣ आत्म कृपा
और सबसे महत्वपूर्ण है कि हम अपने पर स्वयं कृपा करें । जो मुर्ख हैं, जो अज्ञानी हैं, जिन्हें जीवन का रहस्य , उद्देश्य नही पता चल पाया, उनकी बात छोड़िये, दासाभास और आपको तो पता चल गया । फिर भी दासाभास भजन म नही लग रहा, भटकता है इधर उधर ।

यहाँ अपने ऊपर अपनी कृपा चाहिए कि दासाभास, बहुत हो गया , अब लग जा । अथवा शरीर म विराजमान जो आत्मा है, उसकी आवाज सुनी जाये । उसकी कृपा ही है ये कि वह आत्म तत्व हमे प्रति क्षण सावधान करता है ।

यदि हम बिलकुल नही सुनते हैं । मद म अंधे हो जाते हैं तो फिर आत्म कृपा भी शांत हो जाती है ।

अतः बहुत हो गया । दासाभास अब तो चेत जा । सावधान हो जा । कोशिश करके इन तीन कृपाओं को प्राप्त करने का प्रयास कर तो फिर दिल्ली अधिक दुर् नहीं ।

शीघ्र ही जीवन का लक्ष्य प्रिया लाल जु की सेवा तुझे प्राप्त होनी ही है ।

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Sunday, 25 September 2016

एक्सपार्ट = गुरु

​✔  *एक्सपार्ट = गुरु*    ✔

▶ र्जिस प्रकार
आप जिससे डांस सीख रहे हो,
वह डांस का जानने वाला या एक्सपर्ट
होना चाहिए,