Monday, 11 July 2016

अभिमान या स्वाभिमान

अभिमान या स्वाभिमान


*अभिमान या स्वाभिमान*

👲🏻अधिकतर अभिमान और स्वाभिमान की बात होती है । लोक दृष्टि से स्वाभिमान का अर्थ अपने *जाति* के अभिमान । अपने *मानव* होने का अभिमान । अपने स्त्री या *अर्धांगिनी* होने के अभिमान को या अपने *पद* की गरिमा को स्वाभिमान कह दिया जाता है

🤕जैसे कार्यालय में एक चपड़ासी एक ऑफिसर से उसकी *गरिमा* के अनुरूप बात ना करे तो स्वाभिमान को चोट पहुंचती है । इसी स्वाभिमान को  थोड़ा  बढ़ा दिया जाए  उसी का नाम अभिमान है ।

😡👿*कुल मिलाकर स्वाभिमान*
*और* *अभिमान दोनों मौसेरे भाई ही हैं*

👴🏻*वैष्णव वृत्ति* में अभिमान और स्वाभिमान दोनों ही *त्याज्य* हैं अभिमान तो करना ही नहीं है किस बात का अभिमान

👳🏻एक वैष्णव तो कृष्ण का दास है । दास माने एक सेवक और शायद दास भी नहीं दासों के दास का दास है । इतना एक तुच्छ सा सेवक यदि हमने अपने आप को मान लिया है तो अभिमान का तो कोई अवकाश ही नहीं है

🙄रही बात स्वाभिमान की कि हम कृष्ण के दास है यह स्वाभिमान तो कम से कम रहना ही चाहिए तो इस विषय में भी चिंतनीय है कि बड़े-बड़े संतों ने , बड़े-बड़े वैष्णवों ने कभी यह स्वीकार ही नहीं किया कि वह कृष्ण के दास बन पाए पूरी तरह

😎तो हम जैसे *जीव* इस बात का भी स्वाभिमान क्या करें कि हम श्री कृष्ण के दास है । तत्वतः तो हम दास ही हैं ।

😌लेकिन दास वाला अपना फर्ज । अपना दायित्व । अपनी जिम्मेदारियां कहां पूरी कर पा रहे हैं । और नहीं पूरी कर पा रहे हैं तो फिर किस बात का स्वाभिमान

👲🏻अतः एक वैष्णव को सदा ही दीन-हीन होकर रहना है । दैन्य ही वैष्णव का भूषण है । *यह देन्यता दिखाने या* *लिखने के लिए ना हो*

💿यह दैन्यता ❤ *हृदय* ❤में हो । और हर्दय से हम स्वीकार करें कि हम श्रीकृष्ण के एक दीन हीन जन है । ना तो हमसे संसार निर्वाह हुआ और ना ही भजन हो पा रहा है

⚱जाने कितने जन्मों में भजन द्वारा हम श्रीकृष्ण की सेवा प्राप्त कर पाएंगे । हम क्षुद्र से एक छोटे से एक 🕷🐜कीट जैसे ठाकुर के सेवक हैं

🐠यदि यह भाव शुरू भी हो जाए तो अभिमान और स्वाभिमान तो फिर कहीं टिकेंगे ही नहीं । दुम दबाकर भाग जायेंगे । और इनका भाग जाना ही हमारे लिए । एक वैष्णव के लिए बहुत बड़े हित की बात है ।

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
LBW - Lives Born Works at vrindabn




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अभिमान या स्वाभिमान

Sunday, 10 July 2016

अतिवादिता


अतिवादिता

*अतिवादिता*

यह बात केवल whatsapp पर ही लागू नहीं होती है। यह बात हमारी समस्त क्रियाओं पर लागू होती है ।

हम में से कुछ लोग केवल *धन* धन धन कमाने में ही लगे रहते हैं

कुछ लोग *कर्जा* ले लेकर धन खर्च करने में ही लगे रहते हैं

कुछ लोग मान *प्रतिष्ठा* में लगे रहते हैं कुछ लोग *स्वाद* में लगे रहते हैं

सब करना है कुछ भी मना नहीं है लेकिन सीमा में *अति* सर्वत्र वर्जयेत्

 मशीन या कंप्यूटर या whatsapp या मोबाइल तभी बुरा है जब उसके चक्कर में हम अपने *दैनिक दायित्वों* को भूल जाए

अथवा वह हमारे जीवन पर इतना हावी हो जाए कि हमारा जीवन *अस्तव्यस्त* हो जाए

अतः अति सर्वत्र वर्जयेत्

ना अति भोजन
ना अति शयन

ना अती कार्य
न अति परिश्रम

ना अती घूमना
ना अती अंतरंग

*अति सर्वत्र वर्जयेत*्
संतुलन में यदि सब होता रहेगा तो कोई भी चीज कोई भी परिस्थिति हमें हानि नहीं पहुंचा सकती अपितु उन सब साधनों से हमें लाभ होता रहेगा


🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
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अतिवादिता

Saturday, 9 July 2016

क्लर्क से ऑफिसर

क्लर्क से ऑफिसर


*क्लर्क से ऑफिसर*

♦️एक *क्लर्क* यदि जिम्मेदारी से क्लर्की करता है तो वह ऑफिसर बन जाता है उसका क्लर्क होना छूट जाता है

♦️फिर यदि जिम्मेदारी से *ऑफिसरी* करता है तो वह मैनेजर बन जाता है और उसकी ऑफिसरी छूट जाती है । इसी प्रकार *मैनेजरी* छूट जाती है

♦️ठीक ऐसे ही हाई स्कूल में अच्छे नंबर से पास होने पर हमें इंटर में एडमिशन मिल जाता है और हाई स्कूल की कक्षा *छूट* जाती है

♦️इंटर में अच्छे नंबर से पास होने पर ग्रेजुएशन में एडमिशन मिल जाता है *इंटर* छूट जाता है

🕹इसी क्रम से शिक्षा लेते लेते एक समय आता है कि शिक्षा छूट जाती है और अच्छी *नौकरी* मिल जाती है

♦️यही संसार का भी क्रम है। संसार में संसार के काम करते-करते हमें इसे *छोड़ना* चाहिए और जिस भजन के लिए जीवन मिला है वह करना चाहिए

♦️लेकिन हम ऐसा नहीं करते हैं । हमारी हालत कुछ कुछ ऐसी है जो *जीवन भर  क्लर्क का क्लर्क* रहा है

♦️अथवा अनेकों वर्षो से *इंटर में ही फेल* हो रहा है यदि पानी भी रुक जाता है तो बदबू आती है । यह तो संसार है इसमें यदि हम लंबे रुक जाएंगे और संसार के ही कामों में लगे रहेंगे तो दुख *अशांति क्लेश* तो होना ही है

♦️अतः संसार में आए हैं अच्छी बात है । *संसार बुरा नहीं है* । इसी संसार में ही रहकर भजन करना है

♦️वास्तव में जिस प्रकार शिक्षा प्राप्त करने का उद्देश्य नौकरी या व्यापार होता है उसी प्रकार इस संसार का उद्देश्य *भजन* या भगवद भक्ति ही है

♦️😔लेकिन हमने उस टारगेट को भुला हुआ है और हम संसार में ही लगे हुए हैं । *संसार को छोड़ने* का प्रयास हमारे मन में नहीं आ रहा है

♦️यदि हम भजन में लग जाएं हमारे समझ में यह आ जाए कि हमारा मूल उद्देश्य *भजन* है यह संसार और संसार की बातें संसार की सेवा उस भजन को प्राप्त करने के लिए है तो संसार भी 😄आनंद देने वाला बन जाएगा

♦️और हम भी अपने जीवन को सफल करते हुए भजन भक्ति द्वारा श्री *कृष्ण*👣 *चरण सेवा* को प्राप्त कर जाएंगे

🚶🚶सब कुछ यही रहना है । सब कुछ ऐसा ही होना है । कुछ भी नहीं बदलना है । केवल अपनी दृष्टि को बदलना है

🏺और जिस कार्य के लिए हमारा जीवन मिला है जो हमारा *परम धर्म* है । जो हमारे जीवन का उद्देश्य है । हमें उस पर केंद्रित रहना है तभी हम आनंदित हो पाएंगे और जीवन को *सफल* बना पाएंगे ।

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚


🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया 
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क्लर्क से ऑफिसर

Friday, 8 July 2016

सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर भाग 19

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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺🏺

 🔮 भाग 19

💡 ज्ञान प्राप्त करना या
उपदेश सुनना तभी
सार्थक है जब उसे
आचरण में उतारा जाए
अन्यथा ग्राम्य चर्चा में
और सत्संग में
अंतर ही क्या है