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Tuesday, 1 May 2018

Dham Vaas। धाम वास


🌺 धाम वास 🌺

🌺 प्रायः देखने में आता है कि
अच्छे निष्ठावान साधको को भी
वृंदावन वास मुश्किल से मिलता है
अनेकानेक अड़चनें आती हैं ।
इससे धैर्य नहीं खोना चाहिए ।
ये धाम निष्ठा को और अधिक
परिपक्व करने के लिए होता है
जैसे- बी.ए, बी.काम सहज में
हो जाता है और इनकी कोई
बखत भी नहीं ।

🌺 सुलभता से प्राप्त होने पर साधक
बार बार घर भागता है ।
कभी गर्मी कभी सर्दी
या अन्य किसी कारण से ।
जिसे यदि बड़ी मुश्किल
से धाम वास मिलता है,
वह फिर सहज धाम
छोड़ता नहीं और धाम निष्ठा पूर्वक
धाम का आनंद लेता है ।

🌺 ठीक वैसे जैसे आई.ए. एस. करना
अत्यधिक कठिन होता है
लेकिन यदि एकबार हो गये तो फिर
जीवन भर की गयी।

🌺 ये जो अड़चने हैं-
ये आई. ए. एस. की प्रतीक हैं ।
अतः इन्हें परीक्षा मानिये
और प्रयास करते रहिये।
बेहद अड़चनो के बाद यदि एकबार
आप आ गए तो फिर वापिस जाने
का नाम नहीं लोगे
और ठाकुर भी यही चाहते हैं
आपसे इसलिए पक्का कर रहे हैं ।

🙏 समस्त वैष्णव वृन्द को दासाभास का प्रणाम

🐚 ।। जय श्री राधे ।। 🐚
🐚 ।। जय  निताई ।। 🐚

🖋 लेखक
दासाभास डॉ गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at Vrindabn

धन्यवाद!!
www.shriharinam.com
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Monday, 2 April 2018

श्री गुरुदेव हैं श्री कृष्ण के दास



✔  *श्री गुरुदेव हैं श्री कृष्ण के दास*    ✔

▶ ऐसे शास्त्र वाक्य, जिनमें गुरु को साक्षात भगवत्स्वरूप कहा गया है,  समष्टि-गुरु से संबंधित है, व्यष्टि-गुरु से नहीं ।
व्यष्टि गुरु तो स्वरूपतः कृष्ण दास होते हैं। उन्हें स्वयं भगवान या विषय विग्रह मानना भक्ति-शास्त्र और श्रीमन्महाप्रभु द्वारा अनुमोदित भक्ति पथ के विरुद्ध है ।
 ▶ उन्हें भगवान से अभिन्न इसलिए  कहते हैं कि वे भगवान के प्रिय होते हैं और उनमें भगवान की शक्ति का प्रकाश होता है-  शिष्य को शिक्षा-दीक्षादि देने के समय भगवान उनमें अपनी शक्ति संचारित करते हैं ।

▶ गुरु और भगवान स्वरूपतः एक नहीं हैं, यह स्वयं भगवान श्री कृष्ण की अपनी उक्ति से सिद्ध है । उन्होंने कहा है-  "पहले गुरुदेव की पूजा करके फिर मेरी पूजा करनी चाहिए ।
जो इस प्रकार करते हैं वे ही सिद्धि लाभ करते हैं ।"
यदि गुरुदेव भगवान से भिन्न न होते तो आगे-पीछे गुरु और भगवान की पूजा करने का कोई अर्थ न होता।

समस्त वैष्णववृन्द को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज
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Wednesday, 30 August 2017

Deeksha


✔ *दीक्षा* ✔

➡ दीक्षा देने और लेने की अनेक विधियां शास्त्र में प्रचलित है ।

➡ गौड़ीय परंपरा के अनुसार पहले नाम दीक्षा दी जाती है, जिसमें हरे कृष्ण महामंत्र साधक को दिया जाता है ।

➡ वह महामंत्र का जप करता है । जप करते करते उसके चि्त्त की शुद्धि और उसके अंदर योग्यता प्राप्त होती है ।

➡ उसके बाद उसको मंत्रदीक्षा जिसमें गोपाल मंत्र दिया जाता है । बिना किसी ऐसे संत या वैष्णव से सुने हुए यदि हम नाम करते भी हैं तो उसको कच्चा चावल कहा गया है ।

➡ कच्चा चावल नहीं खा सकते हैं । 2। 4 ।10 दाने खा लेंगे, लेकिन भरपेट नहीं खाया जाता है जो वैष्णव, जो साधक स्वयं निष्ठापूर्वक महामंत्र करता है । संख्या पूर्वक नाम का आश्रय लेता है वह एक प्रकार से चावल को पकाता है ।

➡ उसके पास जो चावल होता है, जो मंत्र होता है वह पके हुए उबले हुए चावल की तरह से होता है उसके द्वारा कान में महामंत्र को सुनने के बाद जब महामंत्र का जप किया जाता है, उसका फल तीव्र होता है ।

➡ दीक्षा एक परंपरा से जोड़ने का क्रम है । नाम दीक्षा किसी भी वैष्णव संत से ली जा सकती है ।

➡ उसी वैष्णव संत को महामंत्र की नाम दीक्षा देनी चाहिए जो स्वयं नाम में निष्ठा रखता हो ।

➡ फिर उन्हीं संत, वैष्णव से ही मंत्र दीक्षा लेनी चाहिए । फिर भी ऐसा भी होता है । हो सकता है कि नाम दीक्षा आप अपने शिक्षा गुरु से भी ले सकते हैं । किसी भी संत से ले सकते हैं ।

➡ उसके बाद परिस्थिति यदि अनुकूल न हो तो मंत्र दीक्षा किसी अन्य संत वैष्णव से भी ली जा सकती है ।

➡ यह नाम दीक्षा ऐसे ही है जैसे प्री मेडिकल  की कोचिंग होती है । नाम द्वारा एक वैष्णव आपको दीक्षा के योग्य बना देता है ।

➡ चाहे वह फिर स्वयं दीक्षा दे । अथवा कोई वैष्णव अन्य संत दीक्षा दे दे ।

➡ इसलिए यदि आप अपने आप ही नाम महामंत्र कर रहे हैं बहुत अच्छा है । लेकिन किसी नाम निष्ठ महामंत्र सेवी से यदि नाम ले ले तो उसके प्रभाव और उसकी प्रगति में निश्चित ही अंतर महसूस होगा ।

➡ दीक्षा किसी अन्य वैष्णव । संत । गोस्वामी । आचार्य से बाद में ले सकते हैं । अपनी यजमानी या शिष्य संख्या बढ़ाने वाले धन, यश लोलुप तथाकथित संत, आचार्य तुरंत ही बिना जांचे परखे भी दीक्षा देने लगे हैं ।

➡ समस्त वैष्णव जन को दासाभास का प्रणाम

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Thursday, 1 June 2017

Suksham Sutra Part 44



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सूक्ष्म सूत्र / गागर में सागर
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 🔮 भाग 4️⃣4️⃣

💡 व्रत में जिन वस्तुओं को दूषित समझ कर नहीं खाते, अन्य दिनों में उन दूषित पदार्थों को खाना क्या बुद्धिमानी है, एक बार तय कर लो कि क्या खाना उचित है और क्या खाना अनुचित फिर सावन के सोलह सोमवार हों या नवरात्रि या बाकी के दिन .