🔔 नाम में शुद्धि अशुद्धि का विचार 🔔
शास्त्रों में यह स्पष्ट आदेश है
" खाइते शुइते यथा तथा नाम लय"
अथवा
"श्रद्धया हेलया वा नरमात्रं तारयेत्
श्री कृष्ण नाम"
अर्थात् । खाते समय, सोते समय, जैसे तैसे । यानी पूरी छूट हो गई कि किसी भी अवस्था में नाम लिया जा सकता है । 🔴
यहां तक भी कह दिया कि श्रद्धा या उपेक्षा से भी लिया गया नाम नर मात्र को तार देता है ।
यह बात सामान्यतया कही गई और सामान्यतः समझी भी जाती है । लेकिन इसमें एक विशेष भाव दासाभास को समझ आया कि 🔴
जब ऐसी परिस्थितियां खड़ी हो कि शुद्धि हम रख नहीं सकते । अशुद्ध हम हो गए हैं । तो अब नाम न किया जाए । 🔴
ऐसी परिस्थिति । जब नाम बंद होने की, नाम रूकने की, नाम न करने की स्थिति आ जाए तब इस वाक्य को ध्यान करके । 🔴
शुद्धि हो, चाहे अशुद्धि हो, चाहे खा रहे हो, चाहे सो रहे हो, लेटे हुए हो, नाम को जारी रखना है, नाम को चालू रखना है । 🔴
क्योंकि नाम की शक्ति अधिक है नाम निर्पेक्ष है शुद्धि या नाम अशुद्धि के लिए नाम बंद कर दिया जाए । ऐसा कभी नहीं होना चाहिए । 🔴
यह इसका निहित भाव दासाभास ने समझा है । सामान्यतः यथासंभव यदि शुद्धि सम्भव है, शुद्धि के साधन हैं तो अवश्य ही शुद्धि का पालन करते हुए नाम जप करना चाहिए । 🔵
शुद्धि भी अंतः शुद्धि और बाह्य शुद्धि 2 प्रकार की है । शरीर का स्नान, हाथों का शुद्ध होना, आसन का शुद्ध होना, वातावरण का शुद्ध होना यह आता है बाह्य शुद्धि में । 🔵
और अंतर शुद्धि में अंतःकरण का शुद्ध होना आता है । अंतकरण की शुद्धि नाम द्वारा होती है और बाह्य शुद्धि, शरीर की शुद्धि हमारे प्रयासों द्वारा होती है । 🔵
अतः नाम के लिए यथासंभव शुद्धि का विचार अवश्य किया जाए । लेकिन कभी-कभी दासाभास या आप ऐसे फस जाए की शुद्धि का कोई उपाय न मिले तो नाम को बंद न किया जाए । 🔵
अशुद्ध अवस्था में, सोते जागते कैसे भी नाम को चालू रखा जाए । इससे कोई अपराध भी नहीं होगा । 👌👌
इस भाव को सदा ही दासाभास एवम् सब साधकों को ध्यान में रखना चाहिए और "खाइते सुइते" इस बात का दुरूपयोग ना किया जाए ।
🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई ॥ 🐚
🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
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