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Thursday, 10 November 2016

एकादशी व्रत


​✔  *एकादशी व्रत*    ✔

▶ प्राय सभी वैष्णव एकादशी व्रत रखते हैं । एकादशी व्रत का जो सामान्य नियम है, वह है कि साधक दिनभर निर्जल रहे । जल भी ना पीए ।

▶ फिर क्योंकि यह अभ्यास का काम है । सहज नही सभी के लिए । फिर शास्त्र में छूट दी गई कि आप जल ले लीजिए ।

▶ खाली जल से भी काम नहीं चलता तो
कोई फल ले लीजिए

▶ फल से भी नहीं चलता तो फूल ले लीजिए । दूध ले लीजिए । फलाहार ले लीजिए । यह छूटें हैं ।

▶ और दासाभास जानता है कि यदि निर्जल के 100 नंबर हैं तो छूट देने पर नंबर कम होते जाते हैं

▶ इसलिए यथासंभव शरीर से भजन होता रहे अपितु आज के दिन अधिक से अधिक रोज के नियम से कम से कम डबल भजन हो इसके लिए जैसा भी एकादशी का आहार आपको ठीक लगे । आप ले लीजिए ।

▶ एकादशी का मुख्य केंद्र है भजन । दूसरा है रात्रि जागरण । तीसरा हे प्रभु के पास बैठ के उन का स्मरण लीला चिंतन । नाम जप आदि ।

▶ दासाभास का निवेदन है कि खाना न खाना तो शरीर को सात्विकता, शांति, उद्विग्नता रहित विकार रहित बनाए रखने के लिए है ।

▶ दासाभास खाए तो फल और उस पर चकाचक नींबू डाल दें । चकाचक चाट मसाला डालें ।  चका चक उसमें फलाना फ्लेवर डाल दें  चकाचक कुछ भी डाल दें और उसको एक रजोगुणी डिश बना कर खाएं तो आप समझ सकते हैं कि वह रजोगुण उत्पन्न करेगा ।

▶ शरीर में विकार उत्पन्न करेगा केवल वस्तु पर नहीं है मोटी बात है भोजन ऐसा हो जो शरीर में विकार प्रदान न करें । मन में चंचलता पैदा ना करें । शरीर चलता भी रहे और अविकारी । शांत रहे । जिससे हम भजन करें ।

▶ इसके विपरीत हमने भोजन पर तो नियंत्रण कर लिया फल फूल खा लिया । अन्न नहीं खाया लेकिन दिन भर राग द्वेष निंदा करते रह ।

▶ सास बहू के या अटपटे सीरियल देखते रहे, फिल्म देखते रहे, लड़ते रहे , झगड़ते रहे, तो आप सोचिए कि आपने कितना व्रत का पालन किया ।

▶ कदाचित ऐसा भी होता है कि भूल से दासाभास अन्न खा लेता है या दवा आदि कुछ ऐसे कारण बन जाते हैं कि कुछ गड़बड़ खा लेता है ।

▶ तो इसमें भी कदापि ऐसा नहीं है कि इस व्रत को फिर आगे पूरे दिन छोड़ दिया जाए । व्रत को चालू ही रखा जाए ।

▶ वह एक भूल है । उस भूल के लिए हो सकता है कुछ नंबर कम हो जाए । वैसे भी हम लोग जो एकादशी व्रत रखते हैं वह 100 नंबर का तो होता ही नहीं है ।

▶ हम गृहस्थ 25 । 50 नंबर का व्रत रखते हैं । उसमें यदि पांच नंबर कट जाएंगे तो कट जाए बाकी के 40 । 50 नंबर तो हमें प्राप्त करने ही चाहिए । भूल होने पर व्रत का त्याग नहीं करना है यथासंभव ।

▶ यह दासाभास पुनः कहेगा कि भजन पर केंद्रित करें । धीरे धीरे हर एकादशी को थोड़ा थोड़ा भजन बढ़ाएं ।

▶ एकादशी के 1 दिन पहले अपनी सारी माया को समेट दें कि कल एकादशी है और मैं भजन करूंगा या करूंगी ।

▶ प्रयास से दासाभास को  सफलता मिली है । आपको भी मिलेगी धीरे धीरे । मिलेगी । एक दिन में कुछ नहीं होगा । अतः लगे रहिए । लगे रहिए

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn


Friday, 1 July 2016

एकादशी व्रत

Ekadshi Fast

✅    एकादशी व्रत   ✅   

▶ एकादशी व्रत

▶ दो रीतियों से रखा जाता है
▶ एक तो लौकिक कामना । पाप निवारण  । शाप निवारण । धन प्राप्ति । पुत्र प्राप्ति ।आदि की कामना से रखा जाता ह ।ै उसमें कर्मकांड की प्रमुखता रहती है । कर्मकांड की प्रमुखता रहने से उसमें विधि निषेध एवं पारण के समय पंडितों को दान आदि अनेक ध्यान रखने पड़ते हैं ।

▶ जिसका वर्णन प्राय बाजार में मिलने वाली पांच ₹10 की एकादशी की पुस्तकों में प्राप्त हो जाता है और मुझे उसका कोई भी ज्ञान नहीं है।

▶ दूसरी तरह का जो वैष्णव व्रत है उसका मूल उद्देश्य है भजन भजन भजन । किसी भी प्रकार से हमारा भजन उस दिन प्रतिदिन के भजन से डबल या अधिक होना चाहिए ।

▶ रात्रि में भी जागरण होना चाहिए और जागरण होकर भजन करना चाहिए यानी भजन भजन भजन ।

▶ इस वैष्णव व्रत की कोई विशेष विधि नहीं है अधिकारी भेद से साधक की अपनी अवस्था के अनुसार जिसे जैसी सुविधा हो भजन करना चाहिए ।

▶ भजन अधिक हो। मन में रजोगुण । तमोगुण आदि की वृद्धि ना हो इसके लिए भोजन की छुट्टी ।

▶ थोड़ा बहुत अपने शरीर रक्षा के लिए दूध दही आलू फल आदि खा लिया जाए और भजन में लग लिया जाए।

▶ अब यह तो है शत प्रतिशत है ।  इसमें हम अपने स्तर के अनुसार जैसे भी जितना भी कर पाएं धीरे धीरे करते रहें और भजन को बढ़ाते रहें यही इसकी विधि है

▶ भगवान को एकादशी व्रत बेहद प्रिय है और जो वैष्णव व्रत रख के भजन करते हैं उसे भगवान की प्रसन्नता साधित होती है

▶ एक वैष्णवों को भगवान की प्रसन्नता से अधिक चाहिए भी क्या

▶ इसलिए आज के दिन अन्न न खाते हुए फल फूल आदि पर निर्भर रहते हुए भजन को केंद्र में रखना ही एकादशी की विधि है

▶ वेसे एकादशी में तो जो शास्त्रीय आदेश है वह निर्जल रहने का है और आज बहुत संत निर्जल रहते भी है

▶ लेकिन शायद हम गृहस्थी निर्जल नहीं रह सकते तो हमें छूट दी गई है कि हम कुछ फल फूल खा लें

▶ रही पारण की बात तो पारण के लिए सूर्योदय से लेकर लगभग नौ साडे 9:00 बजे तक का एक समय होता है जो व्रत के साथ लिखा रहता है उस समय के बीच में कुछ अन्य खाकर ठाकुर को प्रणाम कर देना और इस व्रत को प्रणाम कर देना ही पर्याप्त है

▶ किसी भी प्रकार ब्राह्मण भोजन दान दक्षिणा की आवश्यकता नहीं है । फिर भी साधक को अपनी श्रद्धा अपनी अवस्था अपने स्तर के अनुसार यथासंभव जैसा बन पड़े वैसा प्रारंभ कर देना चाहिए और धीरे धीरे उसे आगे बढ़ाना चाहिए

🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया  
LBW - Lives Born Works at vrindabn



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