Showing posts with label अनन्यता. Show all posts
Showing posts with label अनन्यता. Show all posts

Monday, 17 July 2017

Anya Abhilasha Rahit


​ ✔  *अन्य अभिलाषा रहित*    ✔

▶ जो शुद्ध या उत्तम भक्ति है । उसमें पहला लक्षण या पहली शर्त है कि वह भक्ति अन्य अभिलाषा से रहित हो ।

▶ अन्य अभिलाषा से पहले ये पता रहे कि  क्या अभिलाषा रहे । अन्य तो नहीं रहेंगी । रहे क्या

▶ अभिलाषा तो एक ही अभिलाषा है ।
श्रीप्रिया लाल जी का सुख ।
श्री कृष्ण सेवा सुख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं ।

▶ कृष्ण का सुख ।
कृष्ण की सेवा ।
कृष्ण की उपासना ।
कृष्ण का नमन ।
कृष्ण का भजन ।
कृष्ण ही कृष्ण ।

▶ अन्य देवी देवता जो हैं उनको प्रणाम करने में कोई मना नहीं है । लोकाचार वर्श अथवा घर की, नगर की, देश की परंपरा वश उनकी पूजा करने में भी कोई मनाही नहीं है ।

▶ लेकिन उनकी भगवद बुद्धि से , भगवान मान कर पूजा करना  अनन्यता में बाधक है । वे भगवान नही । भगवान के दास या प्रकाश हैं

▶ जैसे एक स्त्री एक ही पुरुष को पति रूप में मानती है । साथ ही वह देवर की, ससुर की, सास की, भतीजे की, भाई की भी सेवा करती है लेकिन किसी को पति नहीं मानती । पति एक ही होता है ।

▶ उसी प्रकार अन्य देवी-देवताओं को प्रणाम आदि करने में कोई मनाही नहीं है । वे सब हमारे कृष्ण के ही दास या अंश या प्रकाश हैं । भगवान नहीं

▶ लेकिन हमारे इष्ट हमारे भगवान केवल श्रीकृष्ण ही है यह बुद्धि होने पर भी अन्य अभिलाषा का भाव हो जाता है ।

▶ दूसरा श्री कृष्ण का अनुकूलता पूर्वक सेवन । कंस की तरह नहीं । शिशुपाल की तरह नहीं । दुर्योधन की तरह नहीं ।

▶ वह भक्ति नहीं शत्रुता है । वैसे भी यह परिकर भूत हैं और कृष्ण के आदेश से ही लीला करने के लिए उनके साथ आते हैं ।

▶ इनके साथ जीव की कोई तुलना भी नहीं है ।इसलिए श्री कृष्ण की अनुकूलता पूर्वक, उन्हें जिसमें सुख हो ।

▶ हमें उन्हें देखने में सुख हो यह भाव नहीं, उन्हें जैसे सुख हो और

▶ जीवन में केवल श्रीकृष्ण ही हो ।
कृष्ण स्मृति ।
कृष्ण की बात् ।
कृष्ण की सेवा ।
कृष्ण को चाहना ।
कृष्ण सेवा को पाना ।

▶ कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण और
उनका भजन भजन भजन भजन ।

▶ समस्त वैष्णवजन के चरणों में मेरा सादर प्रणाम


🐚 ॥ जय श्री राधे ॥ 🐚
🐚 ॥ जय निताई  ॥ 🐚

 🖊 लेखक
दासाभास डा गिरिराज नांगिया
LBW - Lives Born Works at vrindabn

Sunday, 22 April 2012

203. ananyataa



अनन्यता
अनन्यता हृदय में विराजने वाला तत्व है. इसे प्रकाशित किया जाए तो कट्टरता बन जाती है.
कट्टरता एक नेगेटिव शब्द है-इसमें से विरोधात्मक-नकारात्मक वाईब्रेश  निकलती है.

किसी भी एक के लिए कट्टर होते ही हम अनेक के विरोधी हो जाते है. 
अतः अनन्यता को ह्रदय में रखते हुए अन्य सभी मत-मतान्तरों 
का सम्मान  होना चाहिए अपितु अपमान तो किसी का होना ही नहीं है.

'अनन्यता' में निष्ठा एक में, अपमान किसी का भी नहीं. 
कट्टरता में अपनी 'निष्ठा' भी एक में और प्रयास यह कि सभी की  निष्ठा इसी में रहे. 
दुसरे के सम्मान  का तो प्रश्न ही नहीं.
JAI SHRI RADHE
DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia

ananyataa