Monday, 17 September 2012
Tuesday, 11 September 2012
244. SHRI GURU
श्री गुरु
नामश्रेष्ठं मनुमपी शचीपुत्रमत्र स्वरूपं
रूपं तस्याग्रजमुरुपुरी माथुरी गोष्ठवाटिम |
राधाकुंदम गिरिवरमहो राधिका माधवाशां
प्राप्तो यस्य प्रथितकृपया श्रीगुरुं तं नतोअस्मी ||
श्रील रघुनाथ गोस्वामी कह रहे है -
सवश्रेष्ठ हरिनाम ,दीक्षा - मंत्र शचिनंदन श्री गोर हरि और उनके परिकर
श्री स्वरूप दामोदर गोस्वामी, श्रील रूप गोस्वामी तथा उनके
ज्येष्ठ - भ्राता श्रील सनातन गोस्वामिका संग,
सर्वश्रेष्ठ श्री मथुरा पुरी और उससे भी अत्यधिक श्रेष्ठ श्रीवृन्दावनधाम,
उस वृन्दावन धाम मैं क्रमश : श्रेष्ठताको प्राप्त श्री गिरिराज गोवर्धन, श्री राधाकुंड और
अहो ! वहाँ पर श्रीश्रीराधामाधव की सेवा प्राप्त करने की परम उत्कट आशा - यह सभी जिनकी
अहैतुकी कृपा से मैंने प्राप्त किया है,
उन श्रील गुरुदेव के श्री चरणों में नतमस्तक होकर प्रणाम करता हूँ |
JAI SHRI RADHE
Wednesday, 5 September 2012
243. GURUDEV
श्री गुरुदेव
श्री गुरुदेव भगवान् से कम नहीं है लेकिन भगवान् भी नहीं है.
माना की आप गुरुदेव को भगवान मान्ते है
तो आपके लिए आपके गुरुदेव भगवान् है मेरे लिए नहीं या
उनके लिए नहीं जो उनके शिष्य नहीं
.
लेकिन श्री कृष्ण श्री राम आदि सबके लिए भगवान् है.
स्वामी रामसुख्दास जी कहते है की
जब तक किसी को संतान प्राप्त नै होती तब तक वेह "पिता"
नहीं कहलाता है. जब तक शिष्य को भगवद्भक्ति रुपी कल्याण प्राप्त
नहीं होता तब तक कोई "गुरु" नहीं कहला सकता.
गुरु वही जो गोविन्द से मिला दे...........
JAI SHRI RADHE
242. ACHINTYA BHADABHED
अचिन्त्य भेदाभेद
की मान्यता है की जीव ब्रह्म में जो भेद-अभेद है
वह बुद्धि या तर्क द्वारा समझने की बजाये
शास्त्र द्वारा समझा जा सकता है
अतः केवल बुद्धि द्वारा अचिन्त्य है.
साधारण भेदाभेद दर्शन की मान्यता है की
जीव ब्रह्म का भेद समझ ही नहीं आ सकता.
जबकि अचिन्त्य भेदाभेद
शास्त्र कृपा से इसे समझ में आने की बात करता है.
अवश्य केवल तर्क या बुद्धि द्वारा ये अचिन्त्य है.
JAI SHRI RADHE
Tuesday, 4 September 2012
241. kada, aho, adya
कदा, अहो, अद्य
'कदा' में भक्त की विकलता प्रकट होती है-
कदा करिश्यसीह माँ कृपा....
हे प्रभु कब ? आखिर कब?? मुझ पर कृपा होगी??
अहो !
"अहो! बकी यं स्तन कालकूटम" में प्रभु की अपरिमित करुना के दर्शन साधक को होते है.
अद्य
में ठाकुर के दर्शन श्रृंगार का अनुपम आनंद साधक को प्राप्त होता.
"आज बनी सुन्दर अति जोड़ी "
यानी जेसे आज बनी है वैसी कभी नहीं बनी.
240. BHGVAAN SBKE SAATH
भगवान सबके साथ
जब रजोगुन या तमोगुण की वृद्धि सृष्टि में अपेक्षित होती है
तो भगवान रज-तमोगुण की वृद्धि को होने देते है
जब सतोगुण की वृद्धि की आवश्यकता होती है उसे भी होने देते है.
लेकिन प्रायः देखने में ये आता है की वे देवताओं के साथ है . सात्विक लोगो के साथ है.
सत्वगुण प्रकाशमय या ट्रांसपरेंट होता है.
अतः भगवन की उपस्तिथि दिखती है.
तमो-रजो गुन आवरनात्मक होते है अतः भगवन की उपस्थिति दीखटी नहीं .
ठीक वैसे, जैसे- शीशे के बर्तन मे अन्दर जो है वह दिखता है स्टील या मिटटी के बर्तन में नहीं दिखता.
भगवन पक्षपाती तो नहीं है लेकिन निष्ठुर भी नहीं है .
रजा ह्रियान्यकशिपू ने जब वर मांग कर देवताओं को अपने आधीन कर लिया तो प्रभु शांत रह आये
उस समय भी हिरान्यकशिपू को असहयोग कर सकते थे,
लेकिन जब अपने भक्त प्रहलाद पर कष्ट आया तो खम्बे से प्रकट हो गए.
JAI SHRI RADHE
Monday, 3 September 2012
239. DVESH KISSE
द्वेष किससे ?
शिव
दक्ष प्रजापति से नहीं
उनके अज्ञान से द्वेष करते थे.
दक्ष प्रजापति
शिव से द्वेष करते थे.
पाप से घृणा में दोष नहीं,
पापी से घृणा में दोष है.
JAI SHRI RADHE
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