Friday, 3 August 2012

233. DHRUV KI BHAKTI


 DHRUV KI BHAKTI

ध्रुव की भक्ति

भगवन की भक्ति करते हुए अपने लिए कुछ मांगना 
शत प्रतिशत भक्ति नहीं  है. सकाम भक्ति है. लेकिन सकाम भक्ति करते करते 
एक अवसर ऐसा आता है की भक्त विशुद्ध भक्ति 
तक पहुच कर भगवान् के श्री चरणों की सेवा के अतिरिक्त 
कुछ नहीं  मांगता . 
न करने से बेहतर है सकाम भक्ति ही सही., भक्ति करो.

ध्रुव को जब उनकी सौतेली माँ ने दुत्कार दिया तो 
ध्रुव न्र भगवान् की उपासना शुरू की. 
कामना यह ही थी की मुझे पिता से भी बड़ा राज्य मिले 
और पिता स्वयं मुझे गोदी में बताने के लिए बुलाये. लेकिन भक्ति भजन 
करते करते जब भगवान प्रकट हुए कहा वर मांगो तो 
ध्रुव ने  कहा की जब आपके श्री चरणों के दर्शन होगये तो अब क्या राज्य और क्या गोदी? 
मुझे तो अपने श्री चरनोको सेवा देदीजिए,

प्रभु ने कहा ध्रुव तुम निश्चित हे मेरी सेवा के अधिकारी हो 
लेकिन तुमने जिस कामना के लिए भक्ति प्रारंभ की थी यह भी पूर्ण करूंगा. 
भगवन ने विशाल राज्य दिया. हजारो वर्ष तक ध्रुव ने राज्य सुख भोगा और अंत में 
मृत्यु के सर पर पैर रखकर भगवद धाम को गए और आज भी तारा मंडल में दर्शनीय है. 

सकाम भक्ति वाला विशुद्ध भक्ति तक पहुचता तो है 
लेकिन उसे देर लगती है बीच का समय या अनेक अनेक जनम कामना पूर्ति में नष्ट हो जाते है.

अतः जल्दी प्रभु चरण प्राप्ति हेतु विशुद्ध भक्ति पर केन्द्रित करना चाहिए. 
कामनायो का अंत नहीं है. इन्हें छोड़ना ही पड़ता है...  
छोड़ना चाहिए भी.
JAI SHRI RADHE

Wednesday, 1 August 2012

232. SACHCHAA PREM



सच्चा प्रेम 

श्री मद भागवत के अजातपक्षाइव श्लोक में एक चिड़िया के बच्चे का 
उदहारण  दिया गया है 
जिसमे बच्चे के पंख नहीं है 
और गिद्द की दृष्टि उस पर पड़ जाती है वह माँ- माँ पुकार रहा है 

इसमें  माँ को याद करने का उद्देश्य अपने जीवन की रक्षा की चाह है .

दूसरा उदहारण  है बछड़े का. उसे घास दो
 नहीं ले रहा कुछ भी खाने को दो नहीं खा रहा. वह तो केवल माँ माँ पुकार रहा है.

लेकिन इसमें भी अपनी भूक मिटने हेतु माँ माँ करना है 

तीसरा उदहारण  है नवविवाहिता नारी का, 
जो है तो पीयर में लेकिन अपने प्रियतम की स्मृति में छीर्ण  हुई जा रही है 
और चाहती है की में अपने पति के पास जाऊ और उनकी यथोचित सेवा करू. 
मेरे बिना वह कष्ट पा रहे होंगे. 
यह भाव स्वामी सेवा के लिए उपयुक्त है इसमें अपने सुख की कामना नहीं है.

एक साधक की, या एक प्रेमी की यही भावना ही सच्चा प्रेम है
अन्यथा स्वार्थ ही है.
JAI SHRI RADHE

SACHCHAA PREM

Monday, 30 July 2012

231. 49 MARUDGAN


 मरुद्गन


४९ मरुद्गन 

दिति दैत्यों की माता थी, इसके दोनों पुत्र हिरण्याक्ष एवं हिरान्यकशिपू को 
जब भगवान् ने मार दिया , तथा देवताओं के अधिपति इन्द्र ने समस्त दैत्यों को मार दिया  तब,
पुत्र-रहित होने पर दिति ने कश्यप से एक ऐसा पुत्र माँगा था जो अपने भाइयो को मारने वाले इन्द्र को मार सके

कश्यप जी ने न चाहते हुए भी कठिन व्रत रखने पर पुत्र होने का वर दिया . 
इधर इन्द्र को पता चला तो ब्रह्मण  वेश वे मौसी की निरंतर सेवा करते रहे 
और मौका देखकर घुस गए उसके गर्भ में 
उस पुत्र को नष्ट करने के लिया. इन्द्र ने उसके सात टुकड़े कर दिए .
फिर भी वेह जीवित रहे . सात के फिर सात-सात  टुकड़े कर दिए  ४९ हो गए
यह इन्द्र के काटने पर रोते थे . इन्द्र इन्हें कहते थे - मा रुद्द, मत रोयो तो इनका
नाम मरुदगन पड़ा और ४९ मरूदगन  सहित इन्द्र भीपुनः
दिति के गर्भ से प्रकट हुए. 

दिति ने पूछा-इन्द्र ! तुम मेरे गर्भ से?
तब इन्द्र ने समस्त वृतांत बताया. और इन्द्र ने कहा ये मेरे भाई है 
मै  इन्हें अपने साथ ले जाकर देवता बनाऊंगा. इन्हें दैत्य नहीं बनने देंगे .

यही ४९ मरुद्गन हुए.

JAI SHRI RADHE

Wednesday, 25 July 2012

230. KARYA - SIDDHI

KARYA - SIDDHI

कार्य सिद्धि कैसे हो ?
                १. परिश्रम
                २. भाग्य
                ३. कृपा (दैव)
तीनो उतरोतर बलवान है.अर्थात सबसे पहले परिश्रम तो करना ही है

परिश्रम करने पर भाग्य के अनुसार फल मिलता है
भाग्य का पता फल मिलने के बाद ही चलता है की भाग्य अच्छा था या बुरा 

क्युकी भाग्य का किसी को कुछ पता नहीं,
इसलिए परिश्रम तो करना ही चाहिए, करना ही है,

तीसरी है कृपा
कृपा संत की हो, बुज़ुर्ग की हो, गुरु की हो, किसी की हो,
कृपा से भी कार्य सिद्ध होता है, लेकिन कृपा  उनकी प्रसन्नता से  प्राप्त होती है
उनके आदेश पालन से प्राप्त होती है.

अतः किसी भी कार्य हेतु बस लग जाना ही
प्राथमिक उपाय है
JAI SHRI RADHE

Tuesday, 24 July 2012

229. GURU 4 PRAKAR K


गुरुदेव चार प्रकार के

            १. साक्षी रूप में विराजमान शरीर में
            २. शिक्षा गुरु
            ३. दीक्षा गुरु 
            ४. सदगुरुदेव 
दीक्षा गुरु जब मस्तक पर हाथ रखकर आत्मसात = स्वीकार कर लें तब सद्गुरुदेव 

जय श्री राधे 

Wednesday, 4 July 2012

228. EXPERT = GURU

 एक्सपार्ट = गुरु

र्जिस प्रकार
आप जिससे डांस सीख रहे हो,
वह डांस का जानने वाला या एक्सपर्ट 
होना चाहिए,

सुन्दर हो या न हो,
धनवान हो या न हो

उसी प्रकार भक्ति या भजन सिखाने वाला
गुरु भी भजन में एक्सपर्ट
होना चाहिए

उसके पास आश्रम हो या न हो,
सुन्दर हो या नहो
व्यवहार कुशल हो न हो
भजन कुशल होना चाहिए

क्योंकि
हम भजन सीखने गए हैं
भक्ति सीखने जा रहे हैं

ख़ास बात यह भी है की
ज़रूरी नहीं
ब्रह्मण ही हो
'किवा विप्र, किवा न्यासी, शूद्र केने नय'

अर्थात भले ही शूद्र हो, लेकिन
भजन यदि जानता है तो
भजन का गुरु बना सकते हैं


JAI SHRI RADHE
DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia

EXPERT = GURU

227. DUSHTATAA



दुष्टता 

         १. बेसिक स्वाभाव जन्य 
         २. वातावरण जन्य
 
वातावरण बदलने से वातावरण जन्य दुष्टता
समाप्त हो जाती है

लेकिन बेसिक स्वाभाव जन्य दुष्टता 
सहज समाप्त नहीं  होती .
  
JAI SHRI RADHE
DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia