✔ *आचार्य कौन* ✔
▶ आचार्य कहते हैं उसे, जो आचरण करे । जो भक्ति भजन के अंगों का आचरण करेगा वह दीन हो जाएगा । और दीन कभी अभिमानी नहीं होता । दीन और अभिमान विरोधी हैं परस्पर ।
▶ अतः सिद्ध हुआ की यदि अभिमानी है तो वह आचार्य नहीं । हाँ अभिमान का आचार्य हो सकता ह । भक्ति का नहीं ।
▶ और इसका दर्शन गौड़ीय आचार्यों में प्रारम्भ से है । आज भी संस्कार में है । न तो हमारे पूर्वाचार्य, न अभी के आचार्य कोई भी चांदी सोने के सिंघासनो पर न बेठे न उनके साथ ऐश्वर्य होता है ।
